Bihar Politics: विधान परिषद चुनाव में सियासी शह-मात का खेल तेज, आज नामांकन का आखिरी दिन, RJD ने नहीं खोले अभी तक पत्ते, NDA के दांव खुले

Bihar Politics: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं।....

विधान परिषद चुनाव में सियासी शह-मात का खेल तेज- फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों (एक सीट पर उपचुनाव) के लिए होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं। सोमवार को नामांकन की अंतिम तारीख होने के कारण राजधानी पटना से लेकर जिला मुख्यालयों तक राजनीतिक हलकों में गहमागहमी तेज है। सभी प्रमुख दलों के उम्मीदवार बिहार विधानसभा परिसर पहुंचकर रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष अपना नामांकन दाखिल करेंगे। इस चुनाव ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की रणनीतियों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

सबसे ज्यादा निगाहें महागठबंधन की अगुवाई कर रही आरजेडी पर टिकी हुई हैं। पार्टी ने अब तक अपने उम्मीदवार के नाम का आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, जिससे अटकलों का बाजार गर्म है। राजनीतिक गलियारों में सुनील सिंह का नाम सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। हालांकि रोहिणी आचार्या को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। यदि उन्हें मौका मिलता है तो विपक्षी दलों को आरजेडी पर परिवारवाद का आरोप लगाने का नया अवसर मिल सकता है।

संख्या बल की दृष्टि से यह चुनाव विपक्ष के लिए आसान नहीं दिख रहा। एक उम्मीदवार की जीत के लिए करीब 28 विधायकों का समर्थन जरूरी माना जाता है, जबकि आरजेडी के पास अकेले पर्याप्त संख्या नहीं है। ऐसे में उसे कांग्रेस, एआईएमआईएम और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ेगा। मौजूदा समीकरणों को देखते हुए विपक्षी खेमे से केवल एक उम्मीदवार के जीतने की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर एनडीए ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है। भाजपा ने भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह को मैदान में उतारकर राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। उनके अलावा डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को भी टिकट दिया गया है।

जदयू ने भी सामाजिक संतुलन साधते हुए ललन प्रसाद, निशांत कुमार, भारती मंडल और शिवरानी देवी पर भरोसा जताया है। वहीं उपेंद्र कुशवाहा और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। सियासी गलियारों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि उनके पुत्र और मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद का रास्ता नहीं मिलता, तो आगे की राजनीतिक रणनीति क्या होगी। उधर चिराग पासवान की पार्टी ने अशरफ अंसारी को मैदान में उतारकर चुनावी मुकाबले को नया रंग दे दिया है। अब सबकी नजरें नामांकन प्रक्रिया और उसके बाद बनने वाले समीकरणों पर टिकी हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ विधान परिषद की सीटों का नहीं, बल्कि बिहार की आगामी सियासी दिशा और दलों की ताकत का भी बड़ा इम्तिहान साबित होगा।