बिहार पंचायत टैक्स: गांवों में लगेगा होल्डिंग टैक्स, हर घर पर पड़ेगा ₹1200 का सालाना बोझ

बिहार पंचायत टैक्स: गांवों में अब पानी, सफाई और स्ट्रीट लाइट के लिए देना होगा पैसा, कैबिनेट मंजूरी का इंतजार।: 16वें वित्त आयोग की शर्त के कारण बिहार सरकार जुटाएगी ₹2,020 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व। व्यावसायिक भवनों पर लगेगा ज्यादा टैक्स।

गांवों में लगेगा होल्डिंग टैक्स, हर घर पर पड़ेगा ₹1200 का सालाना बोझ - फोटो : news 4 nation AI

बिहार के ग्रामीण इलाकों में पहली बार एक ऐसा ऐतिहासिक आर्थिक मॉडल लागू करने की तैयारी चल रही है, जिसके बाद पंचायतें केवल सरकारी अनुदान (फंड) पर निर्भर नहीं रहेंगी। राज्य सरकार ग्राम पंचायतों को होल्डिंग टैक्स और स्थानीय नागरिक सेवाओं के बदले शुल्क वसूलने का कानूनी अधिकार देने जा रही है। वित्त विभाग से इस बड़े प्रस्ताव को हरी झंडी मिल चुकी है और अब इसे अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा जा रहा है। इस व्यवस्था के लागू होते ही ग्रामीण परिवारों को पानी, सफाई और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए हर साल भुगतान करना होगा।


हर परिवार पर पड़ेगा ₹1200 का सालाना बोझ, पंचायतों को मिलेगी अतिरिक्त आय

एक अनुमान के मुताबिक, इस नए टैक्स सिस्टम के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति परिवार पर औसतन ₹1,200 सालाना का आर्थिक बोझ पड़ सकता है। वर्ष 2011 की जनगणना और सामाजिक-आर्थिक एवं जातीय जनगणना (SECC) के अनुसार बिहार के ग्रामीण इलाकों में करीब 1.68 करोड़ परिवार रहते हैं, जिनसे टैक्स वसूली के बाद पंचायतों के पास सालाना लगभग ₹2,020 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व आएगा। इस प्रकार राज्य की सभी 8,053 ग्राम पंचायतों को औसतन ₹25 लाख तक की अतिरिक्त सालाना आय होगी, जिससे वे सरकारी फंड का इंतजार किए बिना नाली, सड़क और सफाई जैसे स्थानीय विकास कार्य तेजी से करा सकेंगी।


16वें वित्त आयोग की कड़ी शर्त के कारण उठाया गया यह कदम

बिहार सरकार द्वारा ग्रामीण इलाकों में टैक्स लगाने की इस पूरी रणनीति के पीछे 16वें वित्त आयोग की एक अनिवार्य शर्त है। आयोग ने वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच बिहार को करीब ₹52,000 करोड़ का भारी-भरकम फंड आवंटित करने का खाका तैयार किया है, जिसमें से चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹6,670 करोड़ मिलने हैं। हालांकि, आयोग की शर्त है कि इस पूरी राशि को प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार को कुल फंड का लगभग 20% (करीब ₹1,300 करोड़) अपने आंतरिक संसाधनों और पंचायत टैक्स के जरिए जुटाना होगा। इसी वित्तीय जरूरत को पूरा करने के लिए सरकार होल्डिंग टैक्स और सेवा शुल्क लागू करने जा रही है।


मकानों के उपयोग के आधार पर तय होगा टैक्स, व्यावसायिक भवनों से ज्यादा वसूली

सरकार ने साफ संकेत दिया है कि ग्रामीण इलाकों के सभी मकानों पर एक जैसा टैक्स नहीं थोपा जाएगा, बल्कि इसके लिए वर्गीकरण किया जाएगा। गांवों के सामान्य आवासीय घरों के लिए टैक्स की दर बेहद कम और रियायती रखी जाएगी, जबकि दुकान, गोदाम, कोचिंग सेंटर या अन्य व्यावसायिक उपयोग में आने वाले भवनों से भारी टैक्स वसूला जाएगा। इसके अलावा, जो संपत्तियां मुख्य सड़क या स्थानीय बाजारों में स्थित हैं, उनके लिए भी अधिक शुल्क तय होगा। इसी तरह पानी की सप्लाई, कचरा प्रबंधन और स्ट्रीट लाइट जैसी सेवाओं के लिए अलग से 'सर्विस चार्ज' का प्रावधान किया जा रहा है।


जनता की जेब और सुविधाओं के सवाल पर सरकार के भीतर ही छिड़ा विवाद

इस नए टैक्स प्लान को लेकर बिहार की सियासत और ग्रामीण समाज में बहस तेज हो गई है, यहाँ तक कि सरकार के कुछ मंत्री भी इसका अंदरूनी विरोध कर रहे हैं। जहाँ एक तरफ सरकार का तर्क है कि पंचायतों के पास खुद का राजस्व होने से गांवों में शहरों जैसी बेहतर सुविधाएं दी जा सकेंगी, वहीं दूसरी तरफ सीमित आय पर निर्भर रहने वाली बड़ी ग्रामीण आबादी के बीच इस बात को लेकर नाराजगी है। लोगों का सवाल है कि क्या टैक्स वसूलने से पहले बिजली, पानी और सफाई की बदहाल व्यवस्था को सुधारा जाएगा या फिर बुनियादी सुविधाएं दिए बिना ही पहले जनता की जेब पर डाका डाला जाएगा।