जेपी आंदोलन के नुक्कड़ कवि सत्यनारायण नहीं रहे, मेरे भारत के कंठहार की आवाज हुई खामोश
Bihar News: बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत को गहरा सदमा लगा है। वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि-गीतकार सत्यनारायण का निधन हो गया।...
Bihar News: बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत को गहरा सदमा लगा है। वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि-गीतकार सत्यनारायण का निधन हो गया। उन्होंने 27 अगस्त की देर रात कदमकुआं स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे 92 वर्ष के थे। उनके इंतकाल की खबर फैलते ही साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
सत्यनारायण सिर्फ कवि और गीतकार नहीं थे, बल्कि जनभावनाओं और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं में आवाज देने वाले संवेदनशील रचनाकार के तौर पर उनकी अलग पहचान थी। उनके गीतों और कविताओं में आम आदमी की पीड़ा, समाज की हलचल और मानवीय संवेदनाओं की गहरी झलक दिखाई देती थी।
‘मेरे भारत के कंठहार’ ने दिलाई अलग पहचान
सत्यनारायण की सबसे चर्चित रचनाओं में बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ शामिल है। वर्ष 2012 में बिहार के शताब्दी वर्ष के अवसर पर रचा गया यह गीत धीरे-धीरे बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया। गीत के जरिए उन्होंने बिहार की मिट्टी, विरासत और सांस्कृतिक गौरव को शब्दों में पिरोया।इसके अलावा उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की थी। उनकी साहित्यिक यात्रा गीत, नवगीत और कविता की विभिन्न धाराओं से होकर गुजरी। लंबे साहित्यिक जीवन में उन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाधर्मिता से समृद्ध किया।
जेपी आंदोलन में नुक्कड़ कविता बनी पहचान
वर्ष 1974 में जब बिहार में जेपी आंदोलन ने व्यापक जनांदोलन का रूप लिया, तब सत्यनारायण नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए लोगों के बीच पहुंचे। उनकी कविताएं सिर्फ कागज तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सड़कों और चौक-चौराहों तक पहुंचीं।उनकी रचनाओं में जनभावना और सामाजिक चेतना की ऐसी रवानी थी, जिसने उन्हें आंदोलन के दौर में अलग पहचान दिलाई। कविता को जनसंवाद का माध्यम बनाने वाले सत्यनारायण की आवाज लंबे समय तक साहित्य और समाज में गूंजती रही।
साहित्य जगत ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
सत्यनारायण के निधन पर संझाबाती पत्रिका के संपादक कवि-कथाकार हेमंत कुमार ने गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि सत्यनारायण के निधन से हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है और काव्य-जगत को गहरा सदमा पहुंचा है।हेमंत कुमार ने उन्हें ‘संवेदना के स्वर का अनुपम गायक’ बताते हुए कहा कि वह सदा के लिए चिरनिद्रा में सो गए। उनके मुताबिक सत्यनारायण बिहार हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष और बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने गीत, नवगीत और कविता की पावन त्रिवेणी के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
नागार्जुन और भारतेन्दु सम्मान से नवाजे गए
साहित्य में उनके योगदान को सरकारों ने भी सम्मान दिया। बिहार सरकार ने उन्हें नागार्जुन सम्मान (2020-21) से सम्मानित किया था। वहीं भारत सरकार की ओर से वर्ष 2023 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार प्रदान किया गया।सत्यनारायण का जाना बिहार की साहित्यिक विरासत के लिए एक बड़ी क्षति है। जेपी आंदोलन के दौर में नुक्कड़ पर गूंजती उनकी कविता से लेकर ‘मेरे भारत के कंठहार’ जैसे गीत तक, उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को उनकी साहित्यिक मौजूदगी का एहसास कराती रहेंगी।