Bihar Tender Scam: टेंडर माफिया का काला साम्राज्य बेनकाब, रिशु श्री की पैरवी से मिलती थी कुर्सी, करोड़ों के कमीशन पर बिकते थे टेंडर, पढ़िए माफिया और अफसरों की सांठगांठ की पूरी कहानी
Bihar Tender Scam: बिहार के बहुचर्चित टेंडर घोटाला सरकारी खजाने पर डाका डालने, टेंडरों की बंदरबांट करने और कमीशनखोरी के जरिए करोड़ों की काली कमाई का ऐसा नेटवर्क था, जिसकी जड़ें विभागों के गलियारों से लेकर बड़े अधिकारियों की कुर्सियों तक फैली हुई थीं
Bihar Tender Scam: बिहार के बहुचर्चित टेंडर घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, वैसे-वैसे सत्ता और सिस्टम के भीतर बैठे भ्रष्टाचार के किरदार बेनकाब होते जा रहे हैं। यह कोई मामूली घोटाला नहीं, बल्कि सरकारी खजाने पर डाका डालने, टेंडरों की बंदरबांट करने और कमीशनखोरी के जरिए करोड़ों की काली कमाई का ऐसा नेटवर्क था, जिसकी जड़ें विभागों के गलियारों से लेकर बड़े अधिकारियों की कुर्सियों तक फैली हुई थीं। जांच एजेंसियों की मानें तो इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड टेंडर माफिया रिशु श्री था, लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके इशारों पर सरकारी तंत्र के कई मोहरे काम कर रहे थे।
भ्रष्टाचार के इस सिंडिकेट पर शिकंजा कसते हुए स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) ने तीन बड़े अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें वित्त विभाग के संयुक्त सचिव मुमुक्षु चौधरी, भवन निर्माण विभाग के पूर्व चीफ इंजीनियर तारिणी दास और बुडको के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर उमेश कुमार सिंह शामिल हैं। तीनों को विशेष अदालत में पेश किए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।जांच में सामने आया है कि रिशु श्री सिर्फ ठेके लेने वाला कारोबारी नहीं था, बल्कि वह अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफर तक प्रभावित करने की हैसियत रखता था। सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2022 में जब मुमुक्षु चौधरी सीतामढ़ी में पदस्थापित थे, तब रिशु श्री ने तत्कालीन जिला प्रशासन के स्तर पर पैरवी कर उन्हें नगर निगम का आयुक्त बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद नगर निगम के कई बड़े टेंडर रिशु श्री की कंपनियों को मिलने लगे।
इस पूरे खेल का सबसे सनसनीखेज खुलासा ईडी द्वारा जब्त किए गए मोबाइल फोन से हुआ। व्हाट्सएप चैट में मुमुक्षु चौधरी और रिशु श्री के बीच हुई बातचीत ने जांच एजेंसियों को चौंका दिया। चैट में मुमुक्षु ने सहरसा नगर निगम का आयुक्त बनने की इच्छा जताई थी। जवाब में रिशु ने लिखा था, "संडे को आप नगर आयुक्त बन जाएंगे।" हैरत की बात यह रही कि उसी रविवार को उनके नियुक्ति आदेश जारी भी हो गए। जांच में दावा किया गया है कि इस पोस्टिंग के लिए करीब 25 लाख रुपये खर्च किए गए थे।
आरोप है कि सीतामढ़ी और सहरसा में पदस्थापना के दौरान मुमुक्षु चौधरी ने एल-1, एल-2 और एल-3 श्रेणी के अधिकांश टेंडर रिशु श्री की कंपनियों को दिलाए। वर्ष 2024 में सहरसा में छठ घाट निर्माण और उसके रखरखाव का लगभग एक करोड़ रुपये का टेंडर भी इसी नेटवर्क के जरिए दिया गया था। ईडी की छापेमारी के दौरान मुमुक्षु चौधरी के ठिकानों से दो करोड़ रुपये नकद बरामद होने की बात भी जांच का अहम हिस्सा बनी।वहीं भवन निर्माण विभाग के पूर्व चीफ इंजीनियर तारिणी दास पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, रिशु श्री ने पूछताछ में स्वीकार किया कि तारिणी दास से उसके करीबी संबंध थे। आरोप है कि विभागीय टेंडरों के एवज में वह कुल राशि का 3.5 प्रतिशत कमीशन लेते थे। जांच में सामने आया है कि रिशु श्री की कंपनियों को 86 करोड़ 43 लाख रुपये से अधिक के 13 टेंडर दिए गए। यदि कमीशन की दर को आधार माना जाए तो करोड़ों रुपये की अवैध कमाई का अनुमान लगाया जा रहा है।
तारिणी दास के पटना स्थित आवास पर ईडी की छापेमारी में 8.53 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे। तलाशी के दौरान एक ऐसी फाइल भी मिली, जिसने पूरे घोटाले की तस्वीर और साफ कर दी। फाइल में एक लिफाफा मिला, जिसमें अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम, पद तथा उन्हें दिए जाने वाले कथित कमीशन का पूरा ब्यौरा दर्ज था। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह दस्तावेज भ्रष्टाचार के पूरे नेटवर्क का ब्लूप्रिंट साबित हो सकता है।
उधर बुडको के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर उमेश कुमार सिंह का नाम भी एक चैट के जरिए सामने आया। रिशु श्री के सहयोगी राणा ने संदेश में लिखा था कि टेंडर की राशि का 2.5 प्रतिशत कमीशन संबंधित इंजीनियर तक पहुंचा दिया गया है। इसी इनपुट के आधार पर हुई छापेमारी में उमेश कुमार सिंह के घर से करीब एक करोड़ रुपये नकद बरामद किए गए।
अब एसवीयू और अन्य जांच एजेंसियां उन सभी टेंडरों की फाइलें खंगाल रही हैं, जो इन अधिकारियों के कार्यकाल में मंजूर हुए थे। सूत्रों की मानें तो यह कार्रवाई अभी शुरुआत भर है। आने वाले दिनों में कई और बड़े अफसर, इंजीनियर और बिचौलिए जांच एजेंसियों के रडार पर आ सकते हैं। बिहार के इस कथित टेंडर घोटाले ने यह संकेत दे दिया है कि सरकारी परियोजनाओं की आड़ में वर्षों से चल रहा कमीशनखोरी का खेल अब कानून के शिकंजे में फंसता नजर आ रहा है।
ब्यूरो रिपोर्ट