Nitish Kumar : जदयू से दूर हुआ मुसलमान तो सीएम नीतीश का भी मोहभंग ! वक्फ संशोधन विधेयक का समर्थन बिहार विधानसभा चुनाव पर डालेगा बड़ा असर

17.70 फ़ीसदी मुसलमान आबादी वाले बिहार में वक्फ संशोधन विधेयक को समर्थन करने से जदयू को बिहार विधानसभा चुनाव में कोई नुकसान होगा या नहीं, यह चर्चा जोरों पर है. लेकिन आंकडे बताते हैं कि हालिया चुनावों में मुस्लिम वोटरों का वोटिंग पैटर्न काफी तेजी से ब

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Nitish Kumar- फोटो : news4nation

Nitish Kumar : वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित हो गया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश की पार्टी जदयू से केंद्र में मंत्री ललन सिंह ने सदन में जोरदार तरीके से इस विधेयक के समर्थन में बातें रखीं. उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि नीतीश कुमार का सेक्युलरिज़्म सिर्फ नारेबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीतियों और योजनाओं के रूप में धरातल पर दिखा है. उन्हें कांग्रेस से सेक्युलरिज़्म का प्रमाणपत्र लेने की कोई ज़रूरत नहीं, उनकी नीतियाँ और उनके कार्य ही उनकी सबसे बड़ी पहचान हैं. बिहार में पिछले 20 वर्षों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक प्रगति के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं. जो देश के किसी भी अन्य राज्यों में देखने को नहीं मिली है. 

जदयू की ओर से लोकसभा में भले ही यह दावा किया जा रहा हो लेकिन पिछले चुनावों के आंकडे बताते हैं कि जदयू से मुसलमान लगातार दूर हुए हैं. मुस्लिम आबादी और मुस्लिम मतदाता संख्या के हिसाब से बिहार में मुसलमान काफी असर डालते हैं. मुस्लिमों के बड़े वर्ग द्वारा वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करने के बाद भी जदयू ने इसे समर्थन क्यों किया इस पर ललन सिंह ने विस्तार से तमाम बातों को रखा. लेकिन पिछले कुछ चुनावों का आंकड़ा देखें तो बिहार में जदयू और मुसलमान एक दूसरे से दूर होते दिखे हैं. 

बिहार में मुसलमान 

बिहार सरकार ने जातिगत सर्वे के आंकड़े अक्तूबर 2023 में जारी किए थे. सर्वे के मुताबिक़ बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ है. इसमें 81.99 फ़ीसदी हिंदू और 17.70 फ़ीसदी मुसलमान हैं. कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और दरभंगा पांच ऐसे जिले हैं जो सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले जिले हैं. वहीं बिहार में करीब 35 से 40 ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं का व्यापक असर पड़ता है. इन सीटों पर 20 से 60 फीसदी तक मुस्लिम वोटर हैं. ऐसे में बिहार में कुल 243 विधानसभा सीटों में करीब 40 सीटों पर सीधे जीत-हार के बीच मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा असर पड़ता है. 

जदयू से दूर हुए मुस्लिम 

सीएसडीएस से जुड़े संजय कुमार की किताब 'बिहार की चुनावी राजनीति: जाति-वर्ग का समीकरण' में जदयू से दूर होते मुस्लिम वोटरों की संख्या का आकलन पेश किया गया है. सीएसडीएस के एक अध्ययन के मुताबिक़ 2015 के विधानसभा चुनाव में जब जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिलकर गठबंधन किया, तो जेडीयू की ओर से लड़ी गई सीटों पर 78 फ़ीसदी और आरजेडी की सीटों पर 59 फ़ीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने उनके पक्ष में मतदान किया. कुल मिलाकर 69 फ़ीसदी मुसलमानों ने इस गठबंधन को वोट दिया. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में 89 फ़ीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने आरजेडी गठबंधन के पक्ष में वोट दिया. 

2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार हार गए. यहां तक कि मौजूदा समय में नीतीश कैबिनेट में जमा खान एक मुस्लिम चेहरे वाले मंत्री हैं, लेकिन वो बीएसपी छोड़कर जेडीयू में आए हैं. इसी तरह लोकसभा चुनाव 2014 में जब नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर चुनाव में उतरे थे तब जदयू को सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली थी. इसी तरह पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव 2024 में भी जदयू के उम्मीदवारों को किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. इसका बड़ा कारण मुस्लिमों का जदयू के बदले कांग्रेस या अन्य उम्मीदवारों को समर्थन करना माना गया. यह एक तरह से जदयू से मुस्लिमों के दूर होने का संकेत रहा. 


बिहार में 73 फ़ीसदी पसमांदा मुस्लिम

बिहार के जातिगत सर्वे में मुस्लिम आबादी लगभग 18 फीसदी मानी गई. लेकिन इसमें अनुमानित रूप से  73 फ़ीसदी पसमांदा मुस्लिम आबादी होने की बातें कही गई हैं. पसमांदा मुस्लिम यानी पिछड़े मुस्लिम. वहीं वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को पेश करते हुए एनडीए की मोदी सरकार ने कहा है कि इससे पसमांदा मुस्लिमों को बड़ा फायदा होगा. सियासी जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने सोची समझी रणनीति के तहत  वक्फ संशोधन विधेयक 2025 का समर्थन किया है. इससे एक ओर पसमांदा वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने और दूसरी ओर हिंदुओं में पैठ ज़माने की नीतीश कुमार की बड़ी रणनीति हो सकती है. 

वंदना की रिपोर्ट

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