Bihar Digital World:स्क्रीन की दुनिया में खोता इंसान! हम सब देख तो रहे हैं, मगर समझना क्यों भूलते जा रहे हैं? सूचनाओं की भीड़ में क्यों खो रही संवेदनाएं,पढ़िए
Bihar Digital World: आज का समय एक ऐसी ख़ामोश तब्दीली का गवाह बन चुका है, जिसने इंसान की संवेदनाओं तक को बदल दिया है। अब हम हर चीज़ को देखते तो बहुत हैं, मगर उसे महसूस करने, समझने और भीतर उतारने की क्षमता धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं।...
Bihar Digital World: दुनिया पहले भी चलती थी, लोग पहले भी जीते थे, दुख-सुख पहले भी थे, मगर आज के दौर में एक ख़ामोश तब्दीली ने इंसान की रूह तक को बदल दिया है। अब हम हर चीज को देखते तो हैं, लेकिन उसे महसूस करने, समझने और अपने भीतर उतारने का हुनर कहीं पीछे छूटता जा रहा है। यही वजह है कि भीड़ के बीच रहते हुए भी इंसान अंदर से तन्हा, थका हुआ और खाली महसूस करने लगा है।
देखने और समझने के बीच की यह महीन दूरी अब हमारे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन सामने होती है। दिनभर सूचनाओं, वीडियोज, तस्वीरों और खबरों की बारिश होती रहती है। हर पल कुछ नया दिखाई देता है, मगर कोई दृश्य दिल में ठहरता नहीं। दुनिया अब अनुभव नहीं रही, बल्कि एक लगातार चलती हुई डिजिटल फिल्म बन गई है, जिसमें हर दृश्य अगले दृश्य से ढंक जाता है।
समय भी जैसे अपनी रफ्तार बदल चुका है। समय ने समय से कहा होगा कि यदि तुम बहुत तेज भागोगे, तो इंसान तुम्हें केवल देखेगा, समझ नहीं पाएगा। यही आज का सबसे बड़ा सच बनता जा रहा है। हम सड़क हादसे देखते हैं, कुछ पल दुखी होते हैं और फिर अगली खबर सब कुछ मिटा देती है। अस्पतालों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं, लेकिन वहां बैठे हर चेहरे के पीछे छिपी बेचैनी और संघर्ष हमारी नजरों से ओझल रह जाते हैं।
बस में सफर कीजिए, उसमें बैठी महिला को देखिए गोद में सोता बच्चा, आंखों में थकान, चेहरे पर जिम्मेदारियों की धूल। देखने वाला उसे सिर्फ एक यात्री समझता है, मगर समझने वाला उसके भीतर एक मां, एक मजदूर, एक संघर्षशील स्त्री और अनिश्चित भविष्य से लड़ती चेतना को पढ़ लेता है। यही फर्क देखने और समझने के बीच की असली दीवार है।
तकनीक ने हमारी जिंदगी आसान जरूर की है, मगर उसने अनुभव को सूचना में बदल दिया है। अब हम घटनाओं के साक्षी तो हैं, मगर उनके सहभागी नहीं। हमारी संवेदनाएं स्क्रॉल होती जा रही हैं। हर दर्द कुछ सेकंड का कंटेंट बनकर रह गया है।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम जितना ज्यादा दुनिया को देख रहे हैं, उतना ही कम उसे अपने भीतर महसूस कर पा रहे हैं। क्योंकि जो केवल आंखों से देखा गया हो, वह याद तो बन सकता है, मगर जीवन का हिस्सा नहीं। समझ ही वह ठहराव है, जहां इंसान दुनिया को सिर्फ देखता नहीं, बल्कि उसे जीता भी है।