Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने 'हर घर नल का जल' योजना में मनमानी पर जताई नाराजगी, ठेकेदार का रद्द अनुबंध बहाल करने और ब्याज सहित बकाया चुकाने का दिया आदेश

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'हर घर नल का जल' के क्रियान्वयन और प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

ठेकेदार को राहत - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार की बहुचर्चित  योजना हर घर नल का जल में हुई मनमानी पर सख्त नाराजगी व्यक्त की। हाईकोर्ट ने बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं और प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट  ने लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा एक ठेकेदार के खिलाफ बिना किसी नोटिस के तानाशाही तरीके से 57 अनुबंधों को रद्द करने और ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई को कानून के सिद्धांतों के विरुद्ध करार दिया है। कोर्ट ने सरकार के इस कदम को प्रशासनिक मनमानी बताते हुए आदेश को रद्द कर दिया है । साथ ही ठेकेदार का रुके हुए बकायो का भुगतान दो महीने के भीतर ब्याज सहित देने का सख्त निर्देश दिया है। कोर्ट ने माना कि विभाग ने बिना किसी पूर्व सूचना  या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों  का पालन किए बिना एकतरफा कार्रवाई की, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने इसे जल्दबाजी में की गई कार्रवाई बताया। विभाग ने बैंक गारंटी या सुरक्षा राशि  को अमान्य बताकर बिना सोचे-समझे 57 एग्रीमेंट एक झटके में रद्द कर दिए।साथ ही ठेकेदार पर धोखाधड़ी का तमगा लगाने की कोशिश की। काम पूरा होने के बावजूद विभाग ने भुगतान रोका। अररिया और फारबिसगंज ब्लॉक में 'हर घर नल का जल' और मुख्यमंत्री निश्चय योजना के तहत गुणवत्तापूर्ण काम पूरा करने और विभाग द्वारा स्वयं संतोषजनक कार्य प्रमाण पत्र जारी करने के बावजूद अधिकारियों ने भुगतान रोक रखा था।  

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और सरकारी विभाग के कार्यशैली गहरी नाराजगी व्यक्त की। जस्टिस गिरिजेश कुमार की एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कागजों में कमियां मिलने मात्र से किसी पर सीधे धोखाधड़ी का आरोप मढ़कर बिना सुनवाई के उसका पक्ष सुने बिना गला घोंट देना असंवैधानिक है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने और हाल के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी नागरिक या व्यापारी के अधिकारों को कुचलने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि दस्तावेज संदेहास्पद थे, तो विभाग को पहले से उसकी जांच करनी चाहिए थी। केवल बाद में उंगली उठाकर अपनी प्रशासनिक चूक को छिपाना और ठेकेदार को बिना नोटिस सजा देनाअस्वीकार्य है।  

हाईकोर्ट ने भारतीय अनुबंध अधिनियम  की धारा 70 का हवाला देते हुए कहा कि जब सरकार ने ठेकेदार से काम ले लिया है और उसकी सेवाएं तथा सुविधाएं अपना ली हैं, तो सरकार अनुचित लाभ नहीं उठा सकती। काम का भुगतान करना विभाग की कानूनी बाध्यता है। हाईकोर्ट ने विभाग के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द  कर दिया है, जिसके तहत अनुबंध खत्म किए गए थे और ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश की गई थी।  हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि विभाग को दस्तावेजों या बैंक गारंटी को लेकर कोई संदेह है भी, तो वह कानून के दायरे में रहकर, उचित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय का पालन करते हुए नए सिरे से जांच करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन मनमानी तानाशाही नहीं चलेगी।  

कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि ठेकेदार मेसर्स एन एस इंटरप्राइजेज का बकाया 1,85,98,200 रुपये (1 करोड़ 85 लाख 98 हजार 200 रुपये) का भुगतान अगले दो महीनों के भीतर ब्याज सहित किया जाए।