क्रिमिनल इतिहास छिपाने वाले सरकारी बाबू पर पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, कोर्ट के कड़े रुख से मचा हड़कंप
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि जो पहले ही कानून की गिरफ्त में है, उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जायेगी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि तीसरा आपराधिक मामला गलती और असावधानी के कारण छूट गया था, कोई दुर्भावना नहीं थी।
Patna High Court : पटना हाईकोर्ट ने सारण के सरकारी बाबू द्वारा क्रिमिनल इतिहास छिपाने के मामले में अग्रिम जमानत याचिका खारिज किया। बिहार के सारण जिले से एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ एक सरकारी सेवक को अपना पुराना आपराधिक मामलों को छिपाना भारी पड़ गया है।
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस कड़े रुख से महकमे में हड़कंप मच गया है।यह पूरा हाई-वोल्टेज मामला सारण जिले के गौरा थाने का है, जहाँ साल 2024 में धारा 384 (वसूली/जबरन उगाही) के तहत कांड संख्या 54/2024 दर्ज किया गया था।
इस मामलें के मुख्य आरोपी महिद्दीन मंसूरी (पिता: हजरत अली, निवासी: सलिमपुर, गौरा, छपरा) ने गिरफ्तारी से बचने के लिए पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले भी 2 अप्रैल, 2025 को हाईकोर्ट ने उन्हें मेरिट के आधार पर अग्रिम जमानत दे दी थी। लेकिन उस जमानत आदेश में एक स्पष्ट शर्त थी कि यदि आरोपी ने अपने किसी भी आपराधिक इतिहास को छिपाया, तो निचली अदालत द्वारा उसकी जमानत रद्द कर दी जाएगी। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि महिद्दीन मंसूरी के खिलाफ पहले से ही तीन गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।
आरोपी ने अपनी जमानत याचिका में गलती से शिकायत वाद संख्या 2274/2021 का जिक्र करना भूल गया था। जब इसका खुलासा हुआ, तो निचली अदालत ने कड़ा कदम उठाते हुए उनकी जमानत बॉन्ड को रद्द कर दिया और उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। इसके बाद आरोपी ने छपरा के सत्र न्यायालय में क्रिमिनल रिवीजन याचिका भी दाखिल की थी, जिसे बाद में 6 जनवरी, 2026 को वापस ले लिया गया और फिर उसने दोबारा पटना हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि जो पहले ही कानून की गिरफ्त में है, उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जायेगी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि तीसरा आपराधिक मामला गलती और असावधानी के कारण छूट गया था, कोई दुर्भावना नहीं थी। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी एक सरकारी सेवक है, इसलिए जेल जाने पर उसकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। लेकिन राज्य के अपर लोक अभियोजक और सूचक के अधिवक्तागणों ने इसका पुरजोर विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि आरोपी निचली अदालत में पहले ही सरेंडर कर चुका था और मुचलका भरकर रिहा हो चुका था, इसलिए वह कानून की रचनात्मक हिरासत में है।
जस्टिस जितेंद्र कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे मनीष जैन बनाम हरियाणा राज्य और निरंजन सिंह मामला) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति पहले से ही अदालत की हिरासत या नियंत्रण में है, उसकी अग्रिम जमानत याचिका कानूनी रूप से टिक ही नहीं सकती। हाईकोर्ट ने महिद्दीन मंसूरी की अग्रिम जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।कोर्ट ने आरोपी को एक राहत देते हुए यह छूट दी है कि वह दो हफ्तों के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करे और नियमित जमानत की याचिका दायर करे। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि आरोपी सरेंडर कर नियमित जमानत याचिका दायर करता है, तो निचली अदालत उसी दिन उसकी याचिका पर विचार करे।