बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत से बदलेगा बिहार का सियासी खेल? JDU-RJD दोनों के सामने ये है नई चुनौती, गठबंधनों के POLITICS पर भी पड़ेगा असर क्या? पढ़िए बिहार की राजनीति का पूरा गुणा गणित

Bihar Politics:कहते हैं जिसने जिसने बिहार की राजनीति को समझने का दावा किया, उन्हें चित्त होना पड़ा है...बांकीपुर चुनाव ने इसे साबित कर दिया है...सवाल है इस जीत से सूबे की राजनीति में क्या बदलाव हो सकते हैं...

पढ़िए बिहार की राजनीति का पूरा गुणा गणित- फोटो : social Media

Bihar Politics:  बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत को कई राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम मान रहे हैं। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पूरे राज्य की राजनीति की दिशा तय हो गई है, लेकिन इस नतीजे ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), महागठबंधन और जन सुराज तीनों के लिए नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत से JDU के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके पारंपरिक सुशासन और अति पिछड़ा वोट बैंक को लेकर खड़ी हो सकती है। नीतीश कुमार की राजनीति लंबे समय से सुशासन और सामाजिक संतुलन की छवि पर आधारित रही है। यदि जन सुराज इस वर्ग में लगातार अपनी पैठ बनाती है, तो JDU के लिए भविष्य में चुनौती बढ़ सकती है। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि पार्टी के असंतुष्ट नेताओं का एक वर्ग प्रशांत किशोर की ओर आकर्षित हो सकता है, हालांकि फिलहाल इसके ठोस संकेत सामने नहीं आए हैं।

दूसरी ओर, RJD के लिए भी यह परिणाम चिंता का विषय माना जा रहा है। बांकीपुर में RJD तीसरे स्थान पर रही और उसकी जमानत जब्त हो गई। कुछ विश्लेषकों का आकलन है कि सत्ता परिवर्तन चाहने वाले युवा मतदाताओं का एक वर्ग अब जन सुराज को भी विकल्प के रूप में देखने लगा है। वहीं, मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रशांत किशोर के बेहतर प्रदर्शन को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज है। हालांकि, यह कहना कि इससे RJD का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण टूट गया है, अभी एक उपचुनाव के आधार पर निष्कर्ष निकालना होगा।

इस चुनाव के बाद महागठबंधन के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि बांकीपुर उपचुनाव में सहयोगी दलों को पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दिया गया। कांग्रेस नेताओं ने गठबंधन की रणनीति पर सवाल खड़े किए, जबकि RJD ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस के बयान को अनुचित बताया। इससे यह संकेत जरूर मिला है कि महागठबंधन के भीतर चुनावी रणनीति को लेकर मतभेद मौजूद हैं।

बिहार की राजनीति पिछले 35 वर्षों से गठबंधन आधारित रही है। अब तक कोई भी दल अपने दम पर सरकार नहीं बना सका है। ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत यदि भविष्य में जन सुराज के विस्तार का आधार बनती है, तो राज्य में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावना मजबूत हो सकती है। इसका असर केवल NDA और महागठबंधन के सीट समीकरणों पर ही नहीं, बल्कि दोनों गठबंधनों के भीतर की राजनीतिक रणनीतियों पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि बांकीपुर एक उपचुनाव था और इसके नतीजों को सीधे पूरे बिहार के आगामी राजनीतिक बदलाव का संकेत मानना उचित नहीं होगा। आने वाले महीनों में ही स्पष्ट होगा कि यह जीत एक स्थानीय राजनीतिक घटना थी या बिहार की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत... इंतजार कीजिए.....