Rishu Shree Tender Case: 4,000 पन्नों की चार्जशीट में 7 आरोपी,ED की रेड में फंसे बाकी अधिकारियों पर क्यों साधी चुप्पी?

ठेकेदार रिशु श्री और पूर्व आईएएस संजीव हंस से जुड़े चर्चित टेंडर घोटाले में एसभीयू (SVU) ने 4,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर दी है।छापेमारी में जिन अधिकारियों के परिसरों से करोड़ों रुपये नकद और रिश्वत के दस्तावेज मिले थे, उनमें से कई नाम SVU की

: ED की छापेमारी से लेकर SVU की चार्जशीट तक, कैसे छोटी होती गई अफसरों की सूची?- फोटो : news 4 nation AI

बिहार के चर्चित रिशु श्री टेंडर प्रकरण में अब एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जांच की शुरुआत में सामने आए अफसरों और विशेष निगरानी इकाई (SVU) द्वारा दाखिल 4,000 पन्नों की चार्जशीट के आरोपियों में भारी अंतर क्यों है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के दौरान कई सरकारी अधिकारियों के परिसरों से करोड़ों रुपये की नकदी, संपत्ति के कागजात और रिश्वत बंटवारे से जुड़ी पर्चियां मिली थीं। हालांकि, जून 2026 में एसभीयू द्वारा दाखिल चार्जशीट में केवल सात लोगों को आरोपी बनाया गया, जिससे जांच एजेंसियों की कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं।


ईडी की जांच के अनुसार, ठेकेदार रिशु श्री से जुड़ी कंपनियां जल संसाधन, स्वास्थ्य, पीएचईडी, नगर विकास, बिडको और भवन निर्माण जैसे कई विभागों में फर्जीवाड़े व सांठगांठ के जरिए टेंडर और सब-कॉन्ट्रैक्ट हासिल करती थीं। आरोप था कि ठेकेदार, निजी कंपनियों और नौकरशाहों के बीच एक सुव्यवस्थित नेटवर्क सक्रिय था, जहां सरकारी टेंडर मंजूर कराने और बिल पास करने के बदले अधिकारियों को भारी-भरकम कमीशन दिया जाता था। इसी सिलसिले में मार्च 2025 में ईडी की छापेमारी के दौरान सरकारी अधिकारियों के परिसरों से ₹11.64 करोड़ नकद और वित्तीय सांठगांठ के साक्ष्य मिले थे।


मार्च 2025 की ईडी कार्रवाई के दौरान तारिणी दास, मुमुक्षु चौधरी, उमेश कुमार सिंह, अयाज अहमद, सागर जायसवाल, विकास झा और साकेत कुमार जैसे सात प्रमुख अधिकारियों के नाम सार्वजनिक हुए थे। ईडी का दावा था कि ये सभी अधिकारी विभिन्न विभागों में निविदा प्रक्रिया और बिलों के भुगतान से संबंधित संवेदनशील पदों पर तैनात थे। हालांकि, बाद में जब राज्य की एसभीयू ने इस मामले में आपराधिक जांच आगे बढ़ाई, तो ईडी की सूची में शामिल कई अधिकारियों के नाम मुख्य जांच प्रक्रिया से गायब होते चले गए।


ईडी की धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) जांच के समानांतर एसभीयू ने भ्रष्टाचार और आपराधिक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की, जिसमें ठेकेदार रिशु श्री के साथ-साथ वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस, संतोष कुमार और पवन कुमार को नामजद किया गया। इस पूरे भ्रष्टाचार नेटवर्क में आईएएस संजीव हंस का नाम सबसे प्रमुख प्रशासनिक चेहरे के रूप में सामने आया। जांच में रिशु श्री और उनके बीच कथित वित्तीय लेनदेन के सुराग मिले, जिसमें करीब ₹69 करोड़ की एक परियोजना की स्वीकृत लागत को अनधिकृत रूप से बढ़ाकर ₹94 करोड़ करने का गंभीर आरोप शामिल है।


वित्तीय अनियमितताओं की जांच में रिशु श्री और उससे जुड़े सिंडिकेट की बेहिसाब संपत्तियों का खुलासा हुआ। ईडी ने जांच के दौरान लगभग ₹265.73 करोड़ को अपराध से अर्जित आय (Proceeds of Crime) के रूप में चिह्नित किया, जिसमें से ₹68.09 करोड़ की संपत्तियों को प्रोविजनल अटैचमेंट के तहत जब्त किया गया। उधर एसभीयू ने कार्रवाई करते हुए रिशु श्री को गिरफ्तार किया, जिसकी तलाशी में लाखों की नकदी और करीब ₹2 करोड़ के कीमती आभूषण बरामद किए गए।


जून 2026 में कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए एसभीयू ने तीन प्रमुख अधिकारियों—मुमुक्षु चौधरी, तारिणी दास और उमेश कुमार सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इन पर रिशु श्री की कंपनियों को नियम विरुद्ध लाभ पहुंचाने और रिश्वत सिंडिकेट का हिस्सा बनने के सीधे आरोप लगे। इसके अलावा, दो अन्य आईएएस अधिकारियों—अभिलाषा शर्मा और योगेश कुमार सागर के ठिकानों पर भी छापेमारी की गई और उन्हें निलंबित कर दिया गया, हालांकि बाद में साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए उन्हें प्राथमिक चार्जशीट से बाहर रखा गया।


24 जून 2026 को एसभीयू ने अदालत में करीब 4,000 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की, जिसमें कुल सात आरोपियों—रिशु श्री, आईएएस संजीव हंस, संतोष कुमार, पवन कुमार, मुमुक्षु चौधरी, तारिणी दास और उमेश कुमार सिंह के नाम शामिल थे। इस चार्जशीट ने शुरुआती जांच की तुलना में एक अलग तस्वीर पेश की, क्योंकि ईडी द्वारा जिन सात अधिकारियों पर शिकंजा कसा गया था, उनमें से चार अधिकारियों (अयाज अहमद, सागर जायसवाल, विकास झा और साकेत कुमार) के नाम एसभीयू की मुख्य चार्जशीट से पूरी तरह गायब दिखे।


इस पूरे प्रकरण ने अब कानूनी और प्रशासनिक हलकों में एक नया मोड़ ले लिया है कि आखिर ईडी की शुरुआती जांच सूची एसभीयू की चार्जशीट तक पहुंचते-पहुंचते इतनी छोटी कैसे हो गई। क्या जिन अफसरों को चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया, उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले या उन्हें प्रशासनिक स्तर पर राहत दी गई? 4,000 पन्नों के इस पुलिंदे के बावजूद टेंडर की शर्तें तय करने, बिल पास करने और कमीशन की अंतिम मनी ट्रेल से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल अभी भी अनुत्तरित बने हुए हैं।