Bihar Politics: दीपक प्रकाश की जाएगी मंत्री की कुर्सी! सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, कुर्सी पर कैसे घिरा है संवैधानिक घेरा, पढ़िए

पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मामला केवल एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान की व्याख्या, संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा और कार्यपालिका की सीमाओं से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

दीपक प्रकाश की जाएगी मंत्री की कुर्सी! - फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार की सियासत में एक नया संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच बहस का नया मोर्चा खोल दिया है। यह मामला केवल एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान की व्याख्या, संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा और कार्यपालिका की सीमाओं से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।याचिका में दावा किया गया है कि दीपक प्रकाश बिहार विधानसभा या विधान परिषद, किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री बनाया गया है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह का तर्क है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) किसी गैर-विधायक को अधिकतम छह महीने तक मंत्री बने रहने की अनुमति देता है, लेकिन यह छूट अस्थायी और एकमुश्त है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि मंत्री नियुक्त होने के बाद वह निर्धारित समय के भीतर किसी सदन का सदस्य बन जाए।

मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनाया गया था। उस समय भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को सरकार के पतन के साथ मंत्रिपरिषद भंग हो गई। फिर 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में उन्हें पुनः मंत्री पद की शपथ दिला दी गई। याचिका में यही सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 20 नवंबर 2025 से शुरू हुई छह महीने की संवैधानिक अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में नई सरकार द्वारा पुनर्नियुक्ति कर छह महीने की अवधि को दोबारा शुरू मान लेना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह संवैधानिक प्रावधानों का ऐसा इस्तेमाल है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से गैर-विधायक मंत्री को अतिरिक्त समय देने की कोशिश की गई।

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित फैसले S.R. Chaudhuri v. State of Punjab का भी हवाला दिया गया है। उस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत दी गई छह महीने की छूट को बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री बदलने, मंत्रिमंडल भंग होने, फेरबदल होने या पुनर्नियुक्ति के आधार पर इस अवधि को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर इस याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को लगातार मंत्री बनाया जाता रहा तो इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही, जनप्रतिनिधित्व और सामूहिक उत्तरदायित्व जैसी संसदीय व्यवस्था की बुनियादी अवधारणाएं कमजोर होंगी। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि दीपक प्रकाश से यह स्पष्ट कराया जाए कि वह किस संवैधानिक अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 164(2), 164(4) और 141 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। साथ ही संवैधानिक नैतिकता, विधि के शासन और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हवाला देते हुए पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।अब इस मामले पर सबकी निगाहें सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अदालत का फैसला केवल दीपक प्रकाश के मंत्री पद का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि सरकार बदलने की स्थिति में गैर-विधायक मंत्रियों को मिली संवैधानिक छूट की सीमा आखिर कहां तक है। यही वजह है कि यह मामला बिहार की सियासत से निकलकर अब राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक बहस का विषय बनता जा रहा है।