Patna Shambhu Girls Hostel Case: SIT की सुस्ती या साजिश? AIIMS को नहीं दिए पूरे मेडिकल दस्तावेज! देरी से इंसाफ पर मंडरा रहा साया, हॉस्पिटल, हॉस्टल और थाना, हर मोड़ पर शक, हर कदम पर ये गंभीर सवाल

राजधानी के बहुचर्चित NEET छात्रा की संदिग्ध मौत मामले में गठित विशेष जांच टीम (SIT) की सुस्त और अधूरी कार्यप्रणाली अब मेडिकल जांच में भी रोड़े अटका रही है।...

NEET छात्रा केस में SIT की सुस्ती या साजिश?- फोटो : reporter

Patna Shambhu Girls Hostel Case:  राजधानी के बहुचर्चित NEET छात्रा दुष्कर्म और संदिग्ध मौत मामले में इंसाफ की आस लगाए बैठे लोगों के लिए एक फिक्रमंद करने वाली खबर सामने आई है। मामले की तह तक पहुंचने के लिए गठित विशेष जांच टीम (SIT) की सुस्त और अधूरी कार्यप्रणाली अब मेडिकल जांच में भी रोड़े अटका रही है। सूत्रों के मुताबिक, SIT द्वारा समय पर और पूरे दस्तावेज उपलब्ध न कराए जाने के कारण AIIMS पटना की फॉरेंसिक जांच बुरी तरह प्रभावित हो रही है। हालात ऐसे हैं कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में विशेषज्ञ डॉक्टर किसी ठोस नतीजे तक पहुंचने में खुद को बेबस पा रहे हैं।

एम्स पटना में इस संवेदनशील केस के लिए एक ‘हाई-लेवल’ मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है। फॉरेंसिक विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार के अनुसार, संस्थान के निदेशक और अधीक्षक के निर्देश पर गठित इस विशेष बोर्ड में कुल पांच वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं। टीम में फॉरेंसिक विभाग के दो विशेषज्ञ, जबकि गायनाकोलॉजी, न्यूरोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग से एक-एक सीनियर डॉक्टर को शामिल किया गया है। बीते एक सप्ताह से यह टीम केस की बारीकियों को खंगाल रही है, लेकिन जांच की रफ्तार कागजी पेंचों में उलझकर सुस्त पड़ गई है।

डॉ. विनय कुमार ने दो टूक कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में मेडिकल रिव्यू पूरी तरह उपलब्ध रिकॉर्ड और समय पर निर्भर करता है। अगर दस्तावेज अधूरे हों या देर से मिलें, तो जांच की कड़ी कमजोर पड़ जाती है। मौजूदा हालात में, जब तक सभी जरूरी मेडिकल और फॉरेंसिक रिकॉर्ड पूरे तौर पर उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना वैज्ञानिक दृष्टि से मुमकिन नहीं है। जरूरत पड़ने पर अन्य विभागों के विशेषज्ञों की मदद लेने की भी बात कही गई है, लेकिन बुनियादी समस्या वहीं की वहीं है रिकॉर्ड की कमी।

सूत्र बताते हैं कि SIT दस्तावेज एक साथ सौंपने के बजाय किस्तों में दे रही है। साक्ष्यों के इस ‘टुकड़ा-टुकड़ा’ मॉडल ने विशेषज्ञों के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। कड़ियों को जोड़ना मुश्किल हो रहा है और हर अधूरी फाइल शक की नई परत खोल रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह महज लापरवाही है या किसी को बचाने की सोची-समझी चाल?

बता दें पटना की नीट छात्रा की संदिग्ध मौत की कहानी 6 जनवरी की रात से ही रहस्यमयी मोड़ लेने लगती है। उसी रात प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में एक महिला सब-इंस्पेक्टर परिजनों से मिलती है, अपना नंबर देती है और कहती है “कुछ भी शक हो तो फोन कीजिएगा।” यह भरोसा था या सिर्फ एक औपचारिकता, इसका जवाब अगले कई दिनों तक नहीं मिला।

7 जनवरी को छात्रा पूरे दिन प्रभात मेमोरियल में बेहोशी की हालत में भर्ती रही। डॉक्टर इलाज में जुटे रहे, लेकिन यह नहीं बताया गया कि बच्ची के साथ आखिर हुआ क्या है। इसी दिन एक रिश्तेदार शंभू गर्ल्स हॉस्टल पहुंचा। हॉस्टल में छात्राएं मौजूद थीं, लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं। जिस कमरे में बच्ची रहती थी, वह साफ-सुथरा मिला। बाद में एक छात्रा ने फोन पर बताया कि वॉर्डन CCTV चेक कर रही थीं। यह सूचना अपने आप में कई सवाल छोड़ गई।

8 जनवरी को शाम होते-होते मामला और गहराता है। प्रभात मेमोरियल के डॉ. अभिषेक परिजनों को बताते हैं कि बच्ची के साथ फिजिकली कुछ हुआ है चोट के निशान हैं, ब्लीडिंग हुई है। परिजनों का दावा है कि शाम करीब छह बजे बच्ची को होश आया। मां को देखते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी और बोली—मेरे साथ गलत हुआ है। इसके बाद डॉक्टरों ने परिजनों को बाहर कर दिया, मानो सच को वार्ड के भीतर ही कैद कर दिया गया हो।

9 जनवरी को रिश्तेदार फिर हॉस्टल पहुंचे। उस वक्त चंचला नाम की केयरटेकर मौजूद थी। कमरे से बच्ची का कुछ सामान और करीब 11 हजार रुपये निकाले गए। फर्श साफ था, लेकिन सामान बिखरा पड़ा था जैसे किसी ने सबूत समेटने की कोशिश की हो। उसी दिन परिजन महिला SI के दिए नंबर पर फोन करते हैं। कदमकुआं थाना की पुलिस आती है, बयान लेती है और केस चित्रगुप्त नगर थाना ट्रांसफर होता है। थाना प्रभारी रोशनी कुमारी अस्पताल पहुंचती हैं, बयान और तस्वीर लेकर चली जाती हैं।

शाम होते-होते हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल अस्पताल पहुंचती हैं। आरोप है कि उन्होंने केस मैनेज करने और हॉस्टल की बदनामी से बचाने की बात कही। बहस बढ़ी, पुलिस बुलाई गई, थप्पड़ चला, थाना ले जाया गया और फिर चुपचाप नीलम अग्रवाल को छोड़ दिया गया। इसके बाद भी बच्ची 9 जनवरी की रात तक बेहोश ही रही।

10 जनवरी को परिजन बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाना चाहते थे, लेकिन डॉक्टर सतीश ने रोका। ICU में बहस और धक्का-मुक्की के बाद बच्ची को मेदांता ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने साफ कह दिया बचने की संभावना सिर्फ 1 फीसदी है। 11 जनवरी दोपहर 12:34 बजे बच्ची को मृत घोषित कर दिया गया।

12 जनवरी को PMCH में पोस्टमार्टम हुआ। एक डॉक्टर ने चुपके से परिजनों से कहा “रेप हुआ है, अंतिम संस्कार मत कीजिए।” गुलबी घाट से शव लौटाया गया, कारगिल चौक पर ASP अभिनव पहुंचे, कहा गया कि परिजनों को बरगलाया गया है। लाठीचार्ज हुआ, एंबुलेंस से शव वापस घाट ले जाया गया और अंतिम संस्कार करा दिया गया।

15 जनवरी को पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के नाम पर बुलाकर घंटों बैठाया गया और कथित तौर पर धमकी भी दी गई। कथित तौर पर 15 जनवरी को परिजन को पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने के लिए चित्रगुप्त थाना प्रभारी रोशनी कुमारी सुबह 10 बजे बुलाती है, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट रात 8 बजे देती है और बच्ची के एक रिश्तेदार को धमकी भी देती है कि 10 साल बाद सोच लेना क्या होगा.बहरहाल, मामला सुर्खियों में है और यह भी तय है कि पटना की नीट छात्रा की मौत अब सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं. यह मामला हॉस्टल व्यवस्था, निजी अस्पतालों की भूमिका और पुलिस जांच की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बन चुका है.अब 127 पन्नों की LAMA रिपोर्ट, पोस्टमार्टम के विरोधाभास और परिजनों के आरोप इस केस को सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का सवाल बना चुके हैं। सबकी नजर अब SIT की अंतिम रिपोर्ट पर है यही तय करेगी कि यह हादसा था या एक सुनियोजित साजिश।

यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता की कसौटी बन चुका है। बिहार भर की निगाहें इस केस पर टिकी हैं। छात्रा के साथ हुई दरिंदगी के बाद से जनाक्रोश उबाल पर है। ऐसे में SIT की यह शिथिलता लोगों के ज़ेहन में खौफ और गुस्सा दोनों पैदा कर रही है। जानकारों की मानें तो अगर दस्तावेज सौंपने में और देरी हुई, तो वैज्ञानिक साक्ष्यों की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। और तब सवाल यही रहेगा जब सबूत ही कमजोर कर दिए जाएंगे, तो पीड़िता को इंसाफ कैसे मिलेगा?