Bihar Teachers Transfer Politics: उर्दू-फारसी-संस्कृत के सरप्लस पर सियासी संग्राम! तेजस्वी ने सम्राट को लिखी चिठ्ठी, कहा- एक शिक्षक भी हटा तो स्कूल में उस विषय की शिक्षा कैसे होगी?

Bihar Teachers Transfer Politics: नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर उर्दू, अरबी, फारसी और संस्कृत विषय के शिक्षकों के कथित भेदभावपूर्ण स्थानांतरण पर सवाल उठाए हैं।...

शिक्षकों के मामले पर तेजस्वी ने सम्राट को लिखी चिठ्ठी- फोटो : reporter

Bihar Teachers Transfer Politics: बिहार की सियासत में अब शिक्षकों के तबादले का मामला महज प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि हक, इंसाफ और शिक्षा के सवाल पर सियासी बहस का अखाड़ा बनता जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर उर्दू, अरबी, फारसी और संस्कृत विषय के शिक्षकों के कथित भेदभावपूर्ण स्थानांतरण पर सवाल उठाए हैं। साथ ही अनुदानित मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षक-कर्मियों के महीनों से लंबित वेतन का मुद्दा उठाते हुए सरकार से तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।

तेजस्वी यादव ने अपने पत्र में कहा है कि बिहार में शिक्षकों के स्थानांतरण की मौजूदा प्रक्रिया को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। खास तौर पर संस्कृत, उर्दू, अरबी और फारसी के शिक्षकों के साथ कथित तौर पर भेदभावपूर्ण और नियमविरुद्ध रवैये की शिकायतों ने शिक्षकों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है।तेजस्वी का आरोप है कि कई विद्यालयों में संस्कृत, उर्दू, अरबी और फारसी के एकमात्र शिक्षक को भी सरप्लस घोषित कर तबादले की सूची में डाल दिया गया है। सियासी सवाल यह है कि जिस स्कूल में किसी विषय का सिर्फ एक शिक्षक हो, उसे भी अगर अतिरिक्त बताकर हटा दिया जाए तो उस विषय की पढ़ाई आखिर कराएगा कौन? कागज पर शिक्षक ‘सरप्लस’ हो सकता है, लेकिन कक्षा में विद्यार्थियों की जरूरत को सरप्लस कैसे माना जा सकता है?

सरप्लस की कवायद पर सवाल, नियमों की किताब दिखा रहे तेजस्वी

तेजस्वी यादव ने पर्याप्त छात्र संख्या वाले विद्यालयों में भी उर्दू, अरबी और फारसी के स्वीकृत पदों को समाप्त अथवा सरप्लस किए जाने की शिकायतों का जिक्र किया है। इतना ही नहीं, पांच वर्ष से कम सेवा अवधि वाले शिक्षकों, संविदा शिक्षकों और हाल में स्थानांतरण प्राप्त चुके शिक्षकों के नाम भी स्थानांतरण सूची में शामिल किए जाने की शिकायत सामने आने की बात कही गई है। तेजस्वी ने इसे महज प्रशासनिक चूक मानने से इनकार करते हुए स्थानांतरण प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि अगर नियमों की अनदेखी हुई है तो पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।यानी मामला अब सिर्फ ‘किसका तबादला हुआ’ तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि तबादले की तलवार किस नियम के तहत चली और उसकी धार सिर्फ कुछ खास विषयों के शिक्षकों पर ही क्यों नजर आ रही है?

उर्दू और संस्कृत दोनों हमारी साझा विरासत

तेजस्वी यादव ने पत्र में उर्दू और संस्कृत को बिहार की साझा सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हुए दोनों भाषाओं के साथ समान व्यवहार की वकालत की है। उन्होंने कहा कि उर्दू भी भारत की मिट्टी में विकसित हुई भाषा है और संस्कृत के साथ उसे समान शैक्षणिक महत्व मिलना चाहिए।भाषा को सियासत का औजार बनाने के बजाय शिक्षा का माध्यम बनाया जाए। सरकार प्रत्येक सरकारी विद्यालय में उर्दू और संस्कृत के शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाए, ताकि विद्यार्थियों को विषय पढ़ने के अधिकार से महरूम न होना पड़े।

मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के वेतन पर भी सरकार को घेरा

तेजस्वी यादव ने अनुदानित मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के करीब 5-6 महीने से लंबित वेतन का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि महीनों तक वेतन नहीं मिलने से कर्मचारियों के परिवारों की शिक्षा, चिकित्सा, रोजमर्रा के खर्च और दूसरी जरूरतें सीधे प्रभावित हो रही हैं।सवाल है जिस शिक्षक को बच्चों को भविष्य का सबक पढ़ाना है, अगर उसी के घर का बजट महीनों से अधर में लटका हो तो उससे कितनी तवज्जो और इत्मीनान से काम की उम्मीद की जा सकती है?तेजस्वी ने सरकार से लंबित वेतन तत्काल जारी करने की मांग की है। उनका कहना है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक-कर्मचारियों को महीनों तक मेहनताना न मिलना न मानवीय दृष्टि से उचित है और न ही संवेदनशील शासन की पहचान।

तेजस्वी की सरकार से 8 मांगें—गलत तबादले रद्द करो

नेता प्रतिपक्ष ने सरकार के सामने आठ बिंदुओं में अपनी मांग रखी है। इनमें उर्दू, अरबी और फारसी शिक्षकों की मौजूदा सरप्लस/स्थानांतरण सूची की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा प्रमुख है।उन्होंने नियमविरुद्ध पाए जाने वाले तबादलों को रद्द करने, विद्यालय में कार्यरत एकमात्र विषय शिक्षक को सरप्लस घोषित करने की प्रक्रिया रोकने और उर्दू, अरबी व फारसी के स्वीकृत पदों को समाप्त नहीं करने की मांग की है।इसके अलावा पांच वर्ष से कम सेवा अवधि वाले, संविदा और हाल में स्थानांतरण प्राप्त शिक्षकों के मामलों की नियमों के मुताबिक दोबारा समीक्षा करने की मांग की गई है।तेजस्वी ने प्रत्येक सरकारी विद्यालय में उर्दू और संस्कृत के शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाने तथा अनुदानित मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के कर्मचारियों का पूरा लंबित वेतन तत्काल जारी करने की मांग भी की है।सबसे अहम मांगों में शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय करना भी शामिल है। तेजस्वी ने कहा है कि पूरी प्रक्रिया में हुई विसंगतियों पर संबंधित अधिकारियों से जवाब लिया जाए और दोषी पाए जाने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई हो।

भाषा नहीं, शिक्षा बचाइए—तेजस्वी का सियासी संदेश

तेजस्वी यादव का पत्र ऐसे वक्त आया है जब बिहार में शिक्षक स्थानांतरण को लेकर पहले से ही सवाल और शिकायतें उठ रही हैं। ऐसे में उर्दू, अरबी, फारसी और संस्कृत जैसे विषयों को लेकर विवाद ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है।तेजस्वी का तर्क है कि शिक्षकों के साथ अन्याय, विद्यार्थियों के शैक्षणिक अधिकारों की अनदेखी और महीनों तक वेतन रोकना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं किया जा सकता।अब गेंद सरकार के पाले में है। देखना होगा कि शिक्षा विभाग इन आरोपों और शिकायतों की किस तरह पड़ताल करता है। क्योंकि मामला सिर्फ तबादले की फाइलों का नहीं है—यह स्कूल की कक्षा, शिक्षक की रोजी-रोटी और बच्चे के पढ़ने के हक से जुड़ा हुआ है।

सियासत में बयान आते-जाते रहते हैं, मगर स्कूल की कक्षा में खाली कुर्सी का असर लंबे वक्त तक रहता है। सरकार के सामने असली इम्तिहान यही है कि प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर किसी भाषा, किसी विषय और किसी शिक्षक के साथ नाइंसाफी न हो।

रिपोर्ट- रंजीत कुमार