सारण के लाल नीरज का कमाल: अमेरिका की लोवेल यूनिवर्सिटी से करेंगे PhD, मिले 2.6 करोड़ की स्कॉलरशिप
बिहार के सारण जिले के नीरज कुमार सिंह ने अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में 'एजुकेशन लीडरशिप' विषय में पीएचडी (PhD) की शुरुआत की है। 2026 बैच के लिए भारत से चुने जाने वाले वह एकमात्र छात्र हैं।
कहते हैं कि जब अपने कन्नी काटने लगें और समाज के ताने हौसले को तोड़ने का काम करें, तब सच्ची मेहनत ही असली हथियार बनती है। बिहार के सारण (छपरा) जिले के लाल नीरज कुमार सिंह की कहानी कुछ ऐसी ही है। अपनों के उपेक्षा और तानों भरे माहौल से निकल कर उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर वैश्विक पटल पर जो मुकाम हासिल किया है, वह हर उस शख्स के लिए करारा जवाब है जो किसी को कमतर आंकता है। अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में 24 अगस्त 2026 से उन्होंने 'एजुकेशन लीडरशिप' विषय में शोध (PhD) की शुरुआत कर दी है। लेकिन इसमें सबसे खास बात यह है कि इस प्रतिष्ठित- 2026 बैच के लिए भारत से चुने जाने वाले नीरज इकलौते छात्र हैं।
अपनों ने ठुकराया, गैरों ने अपनाया, संघर्ष की अनोखी दास्तान
अपनों के ठुकराने के बाद नीरज को गैरों के अपनाए जाने और अपनी जिद के दम पर सारण जिले के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से निकल अमेरिका तक का यह सफर साबित करता है कि इरादे बुलंद हों, तो सात समंदर पार भी सफलता का परचम लहराया जा सकता है। प्रोफेसर बनने के सपने को संजोए नीरज आज करोड़ों युवाओं के लिए एक नया कंपास बन चुके हैं। वहीं नीरज ने बताया कि 2026- 27 बैच में कुल 60 शोधार्थी है।
2.6 करोड़ की फुल- फंडेड स्कॉलरशिप और अकादमिक लोहा
नीरज का यह सफर महज़ एक दाखिला नहीं, बल्कि सिस्टम और विपरीत परिस्थितियों को अपनी काबिलियत से मात देने की दास्तां है। क्योंकि यूनिवर्सिटी ने उन्हें कुल 2.6 करोड़ रुपए की पूरी तरह फंडेड स्कॉलरशिप दी है। इसमें उनकी पूरी ट्यूशन फीस माफी के साथ- साथ हेल्थ इंश्योरेंस और नियमित छात्रवृत्ति भी शामिल है, जिससे उनके रहने- खाने और शोध का हर खर्च सुरक्षित हो गया है। अमेरिका पहुंचने से पहले उनके अकादमिक सीढ़ी के पायदान भी कम दमदार नहीं रहे हैं।
अमेरिकी युवाओं को पढ़ाने के लिए नीरज का हुआ चयन
नीरज सिर्फ शोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपनी योग्यता के बल पर उन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी में शिक्षक की भूमिका भी हासिल कर ली है। शैक्षणिक सत्र 2026- 27 के लिए उन्हें 'टीचिंग असिस्टेंट' नियुक्त किया गया है, जहां वह ग्रेजुएशन और पोस्ट- ग्रेजुएशन के लगभग दो बैच के विद्यार्थियों की अकादमिक राह को आसान बनाएंगे। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एजुकेशन ने उन्हें विशेष रिसर्च वर्कस्पेस भी सौंपा है।
बदलाव की बयार, समावेशी शिक्षा पर फोकस
उनका शोध कोई साधारण थीसिस नहीं है, बल्कि 'बहुभाषी शिक्षा, शिक्षा में बराबरी और समावेशी शिक्षा' जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर आधारित है। वह एक ऐसे शैक्षिक मॉडल की परिकल्पना पर काम कर रहे हैं, जहां भाषा या सामाजिक स्थिति के कारण कोई भी बच्चा पीछे नहीं रहे। वे अपनी इस सफलता का श्रेय अपने सभी प्रोफेसर्स, मेंटर्स, दोस्तों, सहयोगियों और उन सभी लोगों को देते हैं, जिन्होंने उनकी उच्च शिक्षा की यात्रा में उनका मार्गदर्शन किया, सहयोग दिया और उनका हौसला बढ़ाया। पीएचडी शुरू करने से पहले उन्होंने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया (UPenn), मुंबई के टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS), चेन्नई के राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान (RGNIYD) और जय प्रकाश विश्वविद्यालय (JPU) से अपनी शिक्षा प्राप्त की है।
सारण से धर्मेन्द्र रस्तोगी की रिपोर्ट