Bhojpur Encounter:चार गोलियां, एक मौत और कई अनुत्तरित सवाल... भरत तिवारी एनकाउंटर पर घिरती पुलिस, एनकाउंटर की कहानी पर ये हैं नए सवाल

Bhojpur Encounter: भोजपुर के आरा में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर ने पुलिस कार्रवाई, मानवाधिकार और कानून व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एनकाउंटर की कहानी पर घिरी पुलिस- फोटो : reporter

Bhojpur Encounter: भोजपुर के आरा में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर ने पुलिस कार्रवाई, मानवाधिकार और कानून व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस युवक को कुछ दिन पहले पुलिस की ओर से मानसिक रूप से अस्वस्थ बताया जा रहा था, उसी युवक की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद अब पूरे मामले पर बहस तेज हो गई है।

भरत तिवारी का नाम उस वक्त चर्चा में आया था जब उस पर पुलिसकर्मियों को पिस्तौल दिखाकर धमकाने और हंगामा करने का आरोप लगा। उस दौरान पुलिस अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि युवक मानसिक रूप से अस्वस्थ है और उसका इलाज कोईलवर स्थित मानसिक आरोग्यशाला में कराया जा रहा था। लेकिन बाद की घटनाओं ने पूरे घटनाक्रम को नए सवालों के घेरे में ला दिया।

सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो को लेकर परिजन और स्थानीय लोग दावा कर रहे हैं कि भरत तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। वीडियो में कथित तौर पर वह अपना हथियार पुलिसकर्मियों की ओर फेंकता दिखाई देता है। इसके बावजूद उस पर गोली चलने की बात कही जा रही है। दावा है कि युवक को कई गोलियां लगीं, जिसके बाद उसे इलाज के लिए आरा सदर अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर उपचार के लिए पटना के पीएमसीएच रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

मृतक के पिता काशीनाथ तिवारी का आरोप है कि उनके बेटे का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। उनके अनुसार, न तो उसके खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक मुकदमा था और न ही वह किसी संगठित अपराध से जुड़ा हुआ था। पिता का कहना है कि यदि उनका बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ था और उसने आत्मसमर्पण कर दिया था, तो फिर उस पर घातक बल प्रयोग की जरूरत क्यों पड़ी?

यही सवाल अब स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति मानसिक अस्थिरता से जूझ रहा हो, तो ऐसी स्थिति में पुलिस की प्राथमिकता उसे नियंत्रित करना, उपचार उपलब्ध कराना और कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करना होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, पुलिस के सामने मौजूद वास्तविक खतरे और मौके की परिस्थितियों का पूरा सच अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या पुलिस के पास गोली चलाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था? क्या आत्मसमर्पण के बाद भी खतरा बना हुआ था? और यदि युवक को पहले मानसिक रूप से अस्वस्थ माना गया था, तो उसके साथ की गई कार्रवाई का आधार क्या था?

इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच और आधिकारिक रिपोर्ट के बाद ही सामने आ पाएंगे। लेकिन इतना तय है कि भरत तिवारी की मौत ने पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता, जवाबदेही और बल प्रयोग की सीमाओं पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें पुलिस की विस्तृत रिपोर्ट, पोस्टमार्टम निष्कर्ष और संभावित जांच पर टिकी हैं, जो इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती हैं।



रिपोर्ट- आशीष कुमार