94 वीं जयंती पर विशेष : ओशो न पैदा हुए, न मरे, केवल इस धरती की यात्रा की, 35 साल बाद भी कायम है करिश्माई ‘गुरु’ का जादू

94 वीं जयंती पर विशेष : दिवंगत होने के बाद ओशो आज भी प्रासंगिक हैं. ओशो न पैदा हुए, न मरे, केवल इस धरती की यात्रा की है......पढ़िए आगे

कायम है करिश्मा - फोटो : SOCIAL MEDIA

N4N DESK : ओशो को दिवंगत हुए आज लगभग 35 साल हो गए है। लेकिन उनके विचार आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं। आज भी उनकी पुस्तकें लोग चाव से पढ़ते हैं, जो बाज़ार में आसानी से उपलब्ध हैं। वहीँ उनके प्रवचनों के रिल्स और वीडियो भी काफी लोकप्रिय होते हैं, जिनके व्यूज लाखों में होते हैं। आज ओशो की 94 वीं जयंती हैं। उनका जन्म चन्द्र मोहन जैन के रूप में 11 दिसंबर 1931 को भारत के मध्य प्रदेश में हुआ था, 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे। दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत करते हुए, उन्होंने जल्द ही 'आचार्य रजनीश' के नाम से सार्वजनिक व्याख्यान देना शुरू कर दिया। उनके शुरुआती संदेश में समाज, धर्म और परंपराओं की आलोचना शामिल थी, और उन्होंने 'सेक्स से सुपरचेतना' तक के अपने क्रांतिकारी दृष्टिकोण के कारण ध्यान आकर्षित किया। 1970 के दशक तक, उन्होंने अपने अनुयायियों को 'नव-संन्यासी' के रूप में दीक्षित करना शुरू कर दिया, जिन्होंने उनकी गतिशील ध्यान विधियों और दर्शन को अपनाया, जिसने उन्हें भारत और पश्चिम दोनों में एक महत्वपूर्ण पहचान दिलाई।

पुणे आश्रम और 'रजनीशपुरम' का प्रयोग

1970 के दशक के मध्य में, ओशो ने पुणे, भारत में एक आश्रम की स्थापना की। यह 25 हज़ार एकड़ में फैला था, जो जल्द ही पश्चिमी साधकों के लिए एक प्रमुख केंद्र बन गया। इस आश्रम ने उनके अद्वितीय चिकित्सा समूह (थेरेपी ग्रुप्स) और कामुकता पर उनके खुले विचारों के कारण वैश्विक मीडिया का ध्यान आकर्षित किया। हालांकि, 1980 के दशक की शुरुआत में उनके अनुयायियों ने ओरेगन रेगिस्तान में रजनीशपुरम नामक एक बड़े कम्यून की स्थापना की। यह 64,000 एकड़ की कम्यून परियोजना उनकी महत्वाकांक्षा और संगठन क्षमता का प्रमाण थी, जिसने जल्द ही एक शहर के सभी बुनियादी ढांचे को खड़ा कर दिया।

अमेरिका में विवाद और निर्वासन

रजनीशपुरम कम्यून ने अपनी विशिष्ट जीवनशैली, लक्जरी कारों के प्रति ओशो के प्रेम और कम्यून के अंदर के संगठनात्मक कठोरता के कारण तीव्र विवादों को जन्म दिया। जिसके बाद ओशो को आव्रजन उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया। जिसके बाद ओशो को लगभग 17 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। 1985 में उन्हें अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने "विश्व दौरा" किया जब कई देशों ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया।

पुणे वापसी और अंतिम वर्ष

1987 में भारत लौटने के बाद, ओशो ने पुणे में अपने आश्रम को फिर से स्थापित किया, जिसे अब ओशो कम्यून इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना नाम बदलकर 'ओशो' रख लिया और अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने मुख्य रूप से बोलना जारी रखा, लेकिन अब उनके प्रवचन पहले की तुलना में अधिक शांत और आंतरिक प्रकृति के थे। उन्होंने अपने समर्थकों पर जोर दिया कि वे उन्हें एक धार्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि एक "मित्र" के रूप में देखें, जो उन्हें अपने भीतर देखने में मदद कर रहा है। 

विरासत और स्थायी प्रभाव

ओशो की विरासत आज भी जीवित है। उनके 650 से अधिक प्रकाशित कार्यों का अनुवाद दुनिया की दर्जनों भाषाओं में किया गया है, और उनके ध्यान शिविर (Meditation Resorts) और शिक्षा केंद्र दुनिया भर में मौजूद हैं। उनके अनुयायी उन्हें एक साहसी दार्शनिक और एक प्रबुद्ध गुरु मानते हैं, जिन्होंने व्यक्ति को मुक्त सोच, जीवंतता और 'आज में जीने' के लिए प्रेरित किया। ओशो का प्रभाव आज भी आध्यात्मिकता, दर्शन और वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्रों में महसूस किया जाता है, जिससे वह 20वीं सदी के सबसे अभूतपूर्व और अविस्मरणीय आध्यात्मिक आवाज़ों में से एक बने हुए हैं। 19 जनवरी, 1990 को उन्होंने मात्र 58 साल की उम्र में इस दुनिया से अलविदा कहा. पुणे के उनके निवास ‘लाओ ज़ू हाउज़’ में उनकी समाधि बनाई गई। जिसके टॉम्ब स्टोन पर लिखा गया, "ओशो, जो न कभी पैदा हुए, न कभी मरे. उन्होंने 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस धरती की यात्रा की।"