Bihar Education Crisis: शिक्षा विभाग के वादे हो गए हवा-हवाई, बेपटरी हुई पढ़ाई लिखाई , डेडलाइन खत्म, दावे ध्वस्त... न खुले कॉलेज, न शुरू हुआ ट्रांसफर, सुनिए सरकार

Bihar Education Crisis: बिहार में शिक्षा व्यवस्था को नई रफ्तार देने के सरकार के तमाम दावे अब सवालों के घेरे में हैं। ....

शिक्षा विभाग के वादे हो गए हवा-हवाई- फोटो : social Media

Bihar Education Crisis: बिहार में शिक्षा व्यवस्था को नई रफ्तार देने के सरकार के तमाम दावे अब सवालों के घेरे में हैं। 1 जुलाई की डेडलाइन गुजर चुकी है, लेकिन जिन नए डिग्री कॉलेजों और मॉडल स्कूलों में पढ़ाई शुरू होने का ऐलान किया गया था, वहां आज भी सन्नाटा पसरा हुआ है। सरकार की घोषणाएं और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई अब सियासी बहस का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी, बदइंतजामी और प्रशासनिक लापरवाही करार दे रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जल्द सभी अड़चनें दूर कर ली जाएंगी।

सबसे ज्यादा सवाल 5.88 लाख शिक्षकों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर उठ रहे हैं। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कई बार दावा किया कि 30 जून तक तबादले की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। मई के आखिर से जून के अंतिम सप्ताह तक अलग-अलग तारीखों पर कई बार आश्वासन दिया गया, लेकिन अब तक ट्रांसफर पोर्टल पूरी तरह शुरू नहीं हो सका। विभाग के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके पास अब भी विषयवार रिक्त पदों का अद्यतन आंकड़ा नहीं है। ऐसे में रेशनलाइजेशन की प्रक्रिया भी अधूरी पड़ी है।

उधर, शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का कहना है कि 5.80 लाख से अधिक शिक्षकों के ट्रांसफर की नई नीति को कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है और प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उनके मुताबिक तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों को दूर किया जा रहा है तथा जल्द ही ट्रांसफर, मॉडल स्कूलों और नए डिग्री कॉलेजों से जुड़ी प्रक्रिया पूरी कर दी जाएगी। हालांकि फिलहाल छात्र, शिक्षक और अभिभावक यही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर घोषणाओं और हकीकत के बीच की दूरी कब खत्म होगी।

सरकार ने प्रदेश के 211 प्रखंडों में नए डिग्री कॉलेज शुरू करने का वादा किया था। इस योजना को लेकर छात्रों में भारी उत्साह था और करीब 60 हजार विद्यार्थियों ने आवेदन भी कर दिया। लेकिन कॉलेजों में पढ़ाई शुरू करने के लिए 6,752 शिक्षकों की जरूरत थी, जिसकी व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी। पहले स्कूलों के नेट और पीएचडी पास शिक्षकों को कॉलेजों में प्रतिनियुक्त करने का फैसला लिया गया, मगर शिक्षकों के विरोध के बाद सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि न शिक्षक मिले और न ही कॉलेजों में कक्षाएं शुरू हो सकीं।

इसी तरह 38 जिलों में 572 मॉडल स्कूल खोलने की महत्वाकांक्षी योजना भी फिलहाल फाइलों में सिमटी नजर आ रही है। इन स्कूलों के लिए करीब 11 हजार शिक्षकों की जरूरत है। शुरुआत में चयन के लिए 70 प्रतिशत अंक अनिवार्य किए गए, लेकिन पूरे राज्य से महज 200 शिक्षक ही इस कसौटी पर खरे उतर सके। बाद में सरकार ने आनन-फानन में मेरिट का मानक घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया, फिर भी पर्याप्त शिक्षक नहीं मिल सके। नतीजतन एक भी मॉडल स्कूल में पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई।

शिक्षा विभाग की सबसे बड़ी चुनौती डेटा प्रबंधन की कमी बन गई है। बताया जा रहा है कि राज्य के करीब 14 हजार स्कूलों में जरूरत से अधिक शिक्षक तैनात हैं, जबकि कई स्कूल शिक्षक विहीन या भारी कमी से जूझ रहे हैं। पदों का समुचित मिलान नहीं होने से यह तय नहीं हो पा रहा कि किस स्कूल या कॉलेज में कितने शिक्षकों की आवश्यकता है। बिना ठोस तैयारी के तय की गई समय-सीमा अब सरकार के लिए राजनीतिक असहजता का कारण बन गई है।