पटना हाईकोर्ट ने ओबीसी के राजनैतिक आरक्षण की समीक्षा के लिए अति पिछड़ा आयोग को माना वैध, रिट याचिकाओं को किया ख़ारिज

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह तय किया है कि राज्य के नगर निकाय चुनावों में अति पिछड़ा वर्ग को राजनैतिक आरक्षण देने हेतु जरूरी सामाजिक वो आर्थिक आंकड़ों को समीक्षा करने के लिए बिहार राज्य अति पिछड़ा आयोग का समर्पित संस्था के तौर पर अधिसूचना वैध है। चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन एवं जस्टिस पार्थसारथी की खंडपीठ ने सुनील कुमार, हरिनारायण शर्मा और प्रो रामबली सिंह की ओर से दायर रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए ये निर्णय सुनाया। 

रिट याचिकाकर्ताओं की ओर से वरीय अधिवक्ता बसंत कुमार चौधरी, राहुल श्याम भंडारी एवम शशिभूषण कुमार मंगलम ने पक्षों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि राज्य  सरकार ने अति पिछड़ों की राजनैतिक पिछड़ेपन को आंकने में जल्दीबाजी दिखाई। साथ ही आनन फानन में अति पिछड़ा आयोग को आंकलन करने वाली समर्पित संस्था बना दिया। 

राजनैतिक पिछड़ापन को आंकने के लिए होने वाली समर्पित संस्था के दायित्व और कार्य प्रणाली हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने जो  निर्देश के कृष्ण मूर्ति बनाम केंद्र सरकार के मामले में दिया था,उनका पालन नहीं हुआ। राज्य सरकार का पक्ष महाअधिवक्ता पी के शाही ने रखते हुए इन सभी रिट याचिकाओं का विरोध किया।उन्होंने कोर्ट को बताया कि बिहार में अति पिछड़ा आयोग का गठन 2006 में ही हुआ था। इसका उद्देश्य में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के अलावे  राजनैतिक पिछड़ापन का भी आकलन करना था।

यही कारण है कि 2007 में त्रि स्तरीय पंचायती राज चुनावों में राजनैतिक आरक्षण का अति पिछड़ों के लिए पहली बार प्रावधान आया। बिहार में नगर निकाय चुनाव 2022 एवं 2023 में अलग अलग चरणों में पूरे हो गए। याचिकाकर्ताओं ने राज्य के सभी अति पिछड़े नगर निकाय निर्वाचियों को न तो पक्षकार बनाया है और न  ही उनके खिलाफ यह रिट याचिकाएं  दायर की गई है। ऐसे में इन याचिकाओं में पारित कोई भी आदेश निर्वाचित प्रत्याशियों के हित को प्रभावित करेगा । इसलिए अब इन रिट याचिकाओं का कोई कानूनी औचित्य नहीं है। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 4 जनवरी को फैसला सुरक्षित कर लिया था,जिसे आज सुनाया गया।