Teejan Bai:पद्म विभूषण पंडवानी सम्राज्ञी तीजन बाई का निधन, खामोश हो गई लोक संस्कृति की बुलंद आवाज, समाज ने ठुकराया, दुनिया ने सराहा

Teejan Bai: पंडवानी गायन की अप्रतिम साधिका तीजन बाई अब इस दुनिया में नहीं रहीं।...

Padma Vibhushan Teejan Bai Passes Away
भारतीय लोककला ने खोया अनमोल सितारा- फोटो : social Media

Teejan Bai: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने वाली पंडवानी गायन की अप्रतिम साधिका तीजन बाई अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 70 वर्ष की आयु में शनिवार देर रात उन्होंने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हो गया। उनकी दमदार आवाज़, अद्भुत अभिनय और महाभारत की कथाओं को जीवंत कर देने वाली प्रस्तुति ने उन्हें लोक संस्कृति का ऐसा चमकता सितारा बनाया, जिसकी रोशनी देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैली।

तीजन बाई पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके स्वास्थ्य को लेकर देशभर में चिंता थी। वर्ष 2025 में स्वयं नरेद्र मोदी ने उनकी बहू वेणू देशमुख को फोन कर उनका हालचाल जाना था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि तीजन बाई केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति और भारत की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने हरसंभव सहायता का भरोसा भी दिलाया था।24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में पारधी जनजाति के एक साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। वे कभी स्कूल नहीं जा सकीं और बचपन में औपचारिक शिक्षा से वंचित रहीं। बाद में साक्षरता अभियान के माध्यम से वे केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ सकीं। लेकिन जिस प्रतिभा ने उन्हें किताबों से नहीं, बल्कि लोक परंपरा से ज्ञान दिया, उसी ने उन्हें विश्व मंच तक पहुंचा दिया।

उनके भीतर पंडवानी के प्रति जुनून उनके नाना ब्रजलाल को महाभारत की कथाएं गाते-सुनाते देखकर पैदा हुआ। बाद में प्रसिद्ध लोकगायक उमेद सिंह देशमुख ने उनकी प्रतिभा को तराशा। महज़ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उस दौर में महिलाओं को केवल बैठकर वेदमती शैली में पंडवानी गाने की इजाजत थी, जबकि खड़े होकर कापालिक शैली में प्रस्तुति देना पुरुषों का अधिकार माना जाता था। तीजन बाई ने इस सामाजिक बंदिश को तोड़ते हुए पहली महिला के रूप में कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत की। इस साहसिक कदम के कारण उन्हें समाज से बहिष्कार तक झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने फन से कभी समझौता नहीं किया। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बना।भारतीय लोककला में उनके अहम योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें चार मनद डी.लिट. (डी.लिट.) की डिग्री भी प्रदान की गईं, जो किसी लोक कलाकार के लिए अत्यंत दुर्लभ उपलब्धि मानी जाती है।

तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की एक बुलंद आवाज़ का हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाना है। उन्होंने पंडवानी को गांव की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया और यह साबित किया कि प्रतिभा किसी डिग्री या संसाधनों की मोहताज नहीं होती। उनकी विरासत, उनका संघर्ष और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।