Stray Dogs:आवारा जानवर, असुरक्षित सड़कें और सिस्टम की सुस्ती, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कठघरे में किया खड़ा , इंसानी जान बनाम नीतियों की ये बहस हुई तेज

Stray Dogs:सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों और मवेशियों से जुड़े एक अहम और संवेदनशील मामले की सुनवाई शुरू करते हुए देश की सड़कों पर मंडरा रहे ख़तरे पर सख़्त रुख अपनाया है।

Supreme Court Slams States Over Stray Animals Unsafe Roads
आवारा जानवर, असुरक्षित सड़कें और सिस्टम की सुस्ती- फोटो : social Media

Stray Dogs:सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों और मवेशियों से जुड़े एक अहम और संवेदनशील मामले की सुनवाई शुरू करते हुए देश की सड़कों पर मंडरा रहे ख़तरे पर सख़्त रुख अपनाया है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राजमार्गों पर आवारा जानवरों की मौजूदगी को लेकर गहरी चिंता जताई और साफ शब्दों में कहा कि यह सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर इंसानी जान से जुड़ा सवाल है।

अदालत ने राज्यों और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण  द्वारा नियमों के पालन में कोताही का ज़िक्र करते हुए हाल के उन हादसों की ओर इशारा किया, जिनमें न्यायाधीशों तक को सड़क दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा। पीठ ने पूछा कि आखिर राजमार्गों पर बैरिकेडिंग, मवेशियों के लिए आश्रय स्थल और निगरानी व्यवस्था को लेकर ज़मीनी स्तर पर क्या किया जा रहा है। अदालत की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया कि काग़ज़ी नियम और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई अब बर्दाश्त के काबिल नहीं है।

मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने एक अलग ही पहलू अदालत के सामने रखा। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत जैसे देश में, जहां कूड़ा-कचरा, झुग्गी-झोपड़ियां और खुली बस्तियां आम हैं, आवारा कुत्तों को अचानक हटाने से समस्याएं कम होने के बजाय और बढ़ सकती हैं। सिबल ने दलील दी कि आवारा कुत्ते शहरी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और उनका अचानक निष्कासन अनपेक्षित और ख़तरनाक नतीजे ला सकता है।

सिबल का कहना था कि एनिमल बर्थ कंट्रोल और कैच स्टरलाइज़ वैक्सीनेट रिलीज़  जैसी प्रक्रियाएं ही इस समस्या का स्थायी समाधान हैं। उन्होंने कहा कि इन मॉडलों का सफल परीक्षण हो चुका है और समय के साथ ये आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित कर देंगे। ऐसे में व्यापक और जल्दबाज़ी में उठाए गए कदम हालात को बिगाड़ सकते हैं।

पीठ ने इस बहस को आगे बढ़ाते हुए वकीलों से सवाल किया कि संस्थागत क्षेत्रों जैसे स्कूलों और अस्पतालों से आवारा कुत्तों को हटाने का विरोध क्यों किया जा रहा है, जबकि यहां सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। अदालत ने साफ किया कि संवेदनशील आबादी की हिफ़ाज़त उसकी प्राथमिकता है।

इसी दौरान सिबल ने यह भी कहा कि जिस तरह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को जवाबदेह ठहराया जा रहा है, उसी तरह रेल मंत्रालय को भी पशु-संबंधी दुर्घटनाओं की चर्चा में शामिल किया जाना चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने उल्लेख किया कि असम में रेलवे पहले ही इन्फ्रारेड ट्रैकिंग सिस्टम लागू कर चुका है।

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई अब एक बड़े सवाल पर आ टिक गई है क्या व्यवस्था जानवरों और इंसानों, दोनों की सुरक्षा के बीच संतुलन बना पाएगी, या फिर लापरवाही की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ेगी?