Bihar Ara-Ballia Rail Line: भोजपुर -बलिया रेल लाइन से बदलेगी लोगों की किस्मत,सांसद-विधायकों के बाद पूर्व विधायक भी मैदान में, लाखों लोगों की उम्मीदें बढ़ीं

Bihar Ara-Ballia Rail Line: भोजपुर से बलिया के बीच बिछने वाली नई रेल लाइन की सियासत ने अब एक नया रुख अख्तियार कर लिया है

 Buxar Bhojpur rail line
रघुनाथपुर को रेल लाइन से जोड़ने की मांग हुई तेज!- फोटो : social Media

Bihar Ara-Ballia Rail Line: भोजपुर  से बलिया के बीच बिछने वाली नई रेल लाइन की सियासत ने अब एक नया रुख अख्तियार कर लिया है। इस रेल परियोजना में रघुनाथपुर को जोड़ने की पुरानी मांग ने अब जन आंदोलन और एक बड़े इंकलाब की शक्ल इख्तियार कर ली है। सांसदों और विधायकों के बाद अब बक्सर के पूर्व विधायक संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी ने भी इस सियासी जंग में छलांग लगा दी है। उन्होंने रेल मंत्री को एक बेहद तल्ख और प्रभावशाली खत लिखकर हुकूमत के आला हुक्मरानों को इस जनहित के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की है।जनप्रतिनिधियों की इस ताबड़तोड़ लामबंदी से बक्सर और भोजपुर की अवाम में बरसों पुराने इस ख्वाब के मुकम्मल होने की उम्मीदें अब और ज्यादा बुलंद हो गई हैं।

पूर्व विधायक मुन्ना तिवारी ने अपने खत के जरिए दिल्ली के निजाम को आईना दिखाते हुए कहा कि यह प्रस्तावित रेल परियोजना महज़ लोहे की पटरियों का जाल नहीं है, बल्कि यह बक्सर और भोजपुर के ग्रामीण तथा दियारा इलाकों के आर्थिक, सामाजिक और बुनियादी वजूद से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मसला है।

अगर इस रेल मार्ग को रघुनाथपुर के रास्ते नहीं जोड़ा गया, तो यह शाहाबाद की अवाम के साथ सरासर नाइंसाफी होगी। यदि हुकूमत इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो व्यापार को नई उड़ान मिलेगी, किसानों की फसलों को बड़ी मंडियां नसीब होंगी और स्थानीय बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे।

भौगोलिक और ऐतिहासिक लिहाज से रघुनाथपुर बक्सर और भोजपुर की सरहद पर स्थित एक मुख्य केंद्र है। गौरतलब है कि इससे पहले बक्सर के सांसद, डुमरांव के विधायक और ब्रह्मपुर के जनप्रिय विधायक शंभू नाथ सिंह यादव भी रेल मंत्रालय के दफ्तर में अपनी अर्जियां दाखिल कर चुके हैं।

इस चौतरफा राजनीतिक दबाव के बाद अब यह मुद्दा दिल्ली के गलियारों में गूंज रहा है। स्थानीय जनता का साफ कहना है कि अगर केंद्र सरकार ने इस जायज मांग पर सकारात्मक और हमदर्दाना फैसला नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में यह सियासी चिंगारी एक बड़े जन-आक्रोश का रूप ले सकती है। अब देखना यह है कि दिल्ली का रेल मंत्रालय इस जनभावना के आगे घुटने टेकता है या नहीं!