BIHAR NEWS - गया की डिप्टी मेयर सड़क पर सब्जी बेचने को मजबूर,आखिर क्यों आई यह नौबत? पब्लिक देखकर हैरान रह गई

BIHAR NEWS - एससी कोटे से डिप्टी मेयर बनी चिंता देवी अब सब्जी बेचने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि सफाईकर्मी को डिप्टी सीएम बनते देखना अधिकारियों को पसंद नहीं, वहां मेरी उपेक्षा की जाती है।

 BIHAR NEWS - गया की डिप्टी मेयर सड़क पर सब्जी बेचने को मजबू
गया में सब्जी बेच रही डिप्टी मेयर- फोटो : NEWS4NATION

GAYA - एक तरफ केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी गया को मेट्रो सिटी बनाने की बात करते हैं। दूसरी तरफ उन्हीं के लोकसभा क्षेत्र के मुख्यालय गया के एससी कोटे से डिप्टी मेयर बनी चिंता देवी आखिर सड़क पर सब्जी बेचने क्यों बैठ गई। डिप्टी मेयर चिंता देवी को नगर निगम के अपने कार्यालय छोड़ यूं सड़क किनारे सब्जी बेचते देखकर वहां की जनता हैरान रह गयी। 

लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी चिंता देवी से जब इसको लेकर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि नगर निगम में उनकी कोई नहीं सुनता, कार्यालय जाती हूं लेकिन अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा मुझे नजरअंदाज किया जाता है। मैं जनता के द्वारा चुनी हुई प्रतिनिधि हूं फिर भी मेरे सम्मान के साथ खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है।  

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अधिकारी और कर्मचारी करते हैं उपेक्षा

चिंता देवी ने बताया कि उपेक्षा से आहत होकर उन्होंने जनता की सेवा छोड़ सब्जी बेचने का कदम उठाया। उनका कहना है कि अगर डिप्टी मेयर होने के बावजूद उन्हें सम्मान नहीं मिलता, तो उनके पद का कोई महत्व नहीं है।

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40 साल से नगर निगम में सफाईकर्मी का किया काम
 चिंता देवी का संघर्ष भरा जीवन प्रेरणादायक है। वे पिछले 40 वर्षों से नगर निगम में सफाई कर्मी के रूप में कार्यरत थीं। कचरा उठाने और झाड़ू लगाने का काम करने वाली चिंता देवी ने पद आरक्षित होने के कारण अखौरी ओंकार नाथ श्रीवास्तव उर्फ मोहन श्रीवास्तव ने उन्हें डिप्टी मेयर का उम्मीदवार बनाया और उनके समर्थन में मेहनत की। जनता के अपार समर्थन से विजय हासिल की। उनके चुनाव में सफाई कर्मियों, स्थानीय नागरिकों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया।

नगर निगम के अधिकारियों का विरोध
 डिप्टी मेयर बनने के बाद चिंता देवी से लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अधिकारियों की अनदेखी ने उनकी कार्यक्षमता पर सवाल खड़े कर दिए। सब्जी बेचकर विरोध जताने की यह अनोखी घटना नगर निगम के कामकाज पर भी सवाल उठाती है। 

हैरानी की बात है कि इसी गया से एक दलित कोटे का व्यक्ति सांसद और केंद्रीय मंत्री है। लेकिन दूसरी तरफ एक दलित महिला को जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद अपने सम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है।