Bihar Disability Motivation: पैरों से कमजोर... हिम्मत से मजबूत...नाम से भी बड़े हैं शमशेर के हौसले, दिव्यांगता को दी मात

Bihar Disability Motivation: शमशेर उन लोगों के लिए मिसाल हैं, जो मुश्किल हालात के सामने हार मानने के बजाय मेहनत को अपना हथियार बनाकर जिंदगी की नई इबारत लिखते हैं।

Bihar Disability Motivation: पैरों से कमजोर... हिम्मत से मजब
नाम से भी बड़े हैं शमशेर के हौसले- फोटो : reporter

Bihar Disability Motivation:  48 वर्षीय शमशेर उन लोगों के लिए मिसाल हैं, जो मुश्किल हालात के सामने हार मानने के बजाय मेहनत को अपना हथियार बनाकर जिंदगी की नई इबारत लिखते हैं। बचपन में कालाजार की बीमारी के बाद शमशेर का शरीर दिव्यांग हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी अपनी मंजिल के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। किसी के सामने हाथ फैलाकर मदद मांगने या भीख के सहारे जिंदगी गुजारने के बजाय उन्होंने खुद से एक ऐसा वादा किया, जिसने आज उन्हें इलाके में अलग पहचान दिला दी है।

कटिहार के शमशेर ने मेहनत और आत्मसम्मान को अपनी जिंदगी का आधार बनाया। आज वह एलपीजी गैस के डोर-स्टेप वेंडर के तौर पर काम कर रहे हैं। वह रोजाना घर-घर जाकर गैस सिलेंडर पहुंचाते हैं और इसी मेहनत से होने वाली आमदनी से अपने परिवार के साथ सम्मान की जिंदगी जी रहे हैं। शमशेर के मुताबिक, वह प्रतिदिन करीब 10 सिलेंडर लोगों के घर तक पहुंचाते हैं।

उनकी दिनचर्या आसान नहीं है। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद वह रोज काम के लिए निकलते हैं और अपने जिम्मे का काम पूरी लगन से पूरा करते हैं। उनके लिए दिव्यांगता कोई बहाना नहीं, बल्कि जिंदगी से लड़कर आगे बढ़ने की चुनौती है। यही जज्बा उन्हें दूसरे लोगों से अलग बनाता है।कटिहार में शमशेर अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इलाके के लोग उन्हें उनकी मेहनत, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता के लिए जानते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शमशेर ने साबित कर दिया है कि इंसान के हौसले मजबूत हों तो बड़ी से बड़ी मुश्किल भी रास्ते की रुकावट नहीं बन सकती।

शमशेर की कहानी सिर्फ दिव्यांग लोगों के लिए प्रेरणा नहीं है, बल्कि उन युवाओं के लिए भी एक बड़ा सबक है, जो छोटी-छोटी परेशानियों को अपनी नाकामी का बहाना बना लेते हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया पर व्यवस्था और सिस्टम को कोसना आसान है, लेकिन अपने हालात बदलने के लिए जमीन पर उतरकर मेहनत करना कहीं ज्यादा मुश्किल है। शमशेर ने इसी मुश्किल रास्ते को चुना। उन्होंने शिकायतों के बजाय काम को तरजीह दी और अपनी मेहनत से पहचान बनाई। उनकी कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो और मेहनत करने का जुनून हो तो इंसान अपने लिए सम्मानजनक मुकाम बना सकता है।

सच में, शाबाश शमशेर! आपकी कहानी सिर्फ दिव्यांगता को मात देने की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, मेहनत और हौसले की ऐसी मिसाल है, जिसे समाज के हर उस व्यक्ति को पढ़ना और समझना चाहिए जो किसी न किसी बहाने से मेहनत से पीछे हट जाता है।

रिपोर्ट- श्याम कुमार सिंह