Bihar News : नालंदा के इन 5 गांवों में होली में नहीं होती रंगों की बौछार, न जलते हैं चूल्हे, ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं ग्रामीण, जानिए क्या है पूरा मामला

Bihar News : नालंदा के इन 5 गांवों में होली में नहीं होती रं

NALANDA : होली का पर्व आते ही पूरे देश में रंग-गुलाल, ढोल-नगाड़े, फगुआ के गीत और पकवानों की खुशबू से माहौल सराबोर हो जाता है। लेकिन नालंदा जिला मुख्यालय से सटे पांच गांव पतुआना, बासवन बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा में होली का स्वरूप बिल्कुल अलग और आध्यात्मिक है। यहां होली के दिन न तो रंग उड़ता है, न ही गुलाल, और न ही घरों में चूल्हे जलते हैं। पिछले लगभग 54 वर्षों से ये गांव भक्ति और संयम की अनूठी परंपरा निभा रहे हैं।

होली के दिन गांव में छा जाती है आध्यात्मिक शांति

जहां अन्य स्थानों पर होली के दिन रंगों की धूम रहती है, वहीं इन गांवों में सुबह से ही वातावरण भक्तिमय हो जाता है। फगुआ के गीतों की जगह “हरे राम, हरे कृष्ण” की धुन गूंजती है। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सभी कीर्तन में शामिल होकर भगवान के नाम का जाप करते हैं। पूरे दिन गांवों में अनुशासन और शांति का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।

अखंड कीर्तन: उत्सव में अनुशासन का सूत्र

होलिका दहन की शाम से ही 24 घंटे का अखंड कीर्तन शुरू हो जाता है। यह कीर्तन बिना रुके लगातार चलता है। ग्रामीण अनुष्ठान शुरू होने से पहले ही घरों में मीठा भोजन और पकवान तैयार कर लेते हैं। कीर्तन समाप्त होने तक चूल्हा जलाना वर्जित रहता है। अधिकांश लोग नमक का सेवन भी नहीं करते, ताकि शरीर और मन दोनों सात्विक बने रहें। उनका मानना है कि संयम ही सच्ची होली है—जहां मन के विकार जलें और भक्ति का रंग चढ़े।

विवादों से भक्ति तक की यात्रा

ग्रामीणों के अनुसार, पांच दशक पहले होली के अवसर पर इन गांवों में अक्सर विवाद और मारपीट की घटनाएं होती थीं। त्योहार का उल्लास कई बार तनाव में बदल जाता था। इसी पृष्ठभूमि में एक सिद्ध पुरुष संत बाबा ने ग्रामीणों को ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाया। उनके सुझाव पर होली के दिन अखंड कीर्तन की परंपरा शुरू हुई। धीरे-धीरे इस आध्यात्मिक पहल ने गांवों का वातावरण बदल दिया और आपसी सौहार्द स्थापित हो गया।

संत बाबा की प्रेरणा और विरासत

ग्रामीण बताते हैं कि संत बाबा मूल रूप से इमादपुर के निवासी थे। सांसारिक जीवन से विरक्त होकर उन्होंने कम उम्र में ही घर त्याग दिया और पतुआना व बाद में राजाकुआं के खंधे में रहकर तपस्या की। 2 अक्टूबर 2000 को उन्होंने देह त्याग दी। आज उनके आश्रम और समाधि स्थल पर भव्य मंदिर बना हुआ है, जहां होली के दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है। ग्रामीण मानते हैं कि संत बाबा की कृपा से ही गांवों में शांति और सद्भाव कायम है।

बसिऔरा पर रंगों की वापसी

हालांकि होली के दिन पूर्णतः भक्ति और संयम का वातावरण रहता है, लेकिन कीर्तन समाप्त होने के अगले दिन बसिऔरा ग्रामीण परंपरागत तरीके से रंगों की होली खेलते हैं। इस तरह यहां होली दो रूपों में मनाई जाती है पहले दिन आध्यात्मिक साधना और दूसरे दिन उल्लास। इन पांच गांवों की यह परंपरा आज के समय में एक संदेश देती है कि त्योहार केवल बाहरी रंगों का नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक है। यहां होली का असली रंग भक्ति, संयम और एकता में नजर आता है।

राज की रिपोर्ट