19 साल, दो एनकाउंटर, दो माँ का एक जैसा दर्द... आरोपी DSP राजेश शर्मा पर फिर भी मेहरबान बिहार सरकार, 2007 से 2026 तक एक सी मिस्ट्री
4 नवंबर 2007 की रात एमआईटी कॉलेज के पास मनीष महिवाल, मुकुल ठाकुर और सुबोध कुमार सिंह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई थी। 17 जून को शाहपुर थाना क्षेत्र में भरत तिवारी की उसी तरह मुठभेड़ हुई और दोनों जगह विवरों में राजेश शर्मा हैं
Who Is SDPO Rajesh Sharma: भोजपुर के चर्चित भरत भूषण तिवारी कथित एनकाउंटर मामले में आरोपी बनाए गए तत्कालीन जगदीशपुर एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा की मद्यनिषेध विभाग में नई तैनाती ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर भरत तिवारी हत्याकांड में उनके खिलाफ हत्या समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज है, दूसरी ओर सरकार ने उन्हें नई जिम्मेदारी सौंप दी है। कानूनी रूप से सरकार ऐसा कर सकती है, लेकिन नैतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह फैसला बहस का विषय बन गया है।
19 साल पुराना मामला फिर चर्चा में
राजेश कुमार शर्मा का नाम पहली बार विवादों में नहीं आया है। वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा थाने के थानाध्यक्ष रहते हुए उन पर तीन युवकों के कथित फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगा था। 4 नवंबर 2007 की रात एमआईटी कॉलेज के पास मनीष महिवाल, मुकुल ठाकुर और सुबोध कुमार सिंह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई थी। पुलिस ने दावा किया था कि वाहन जांच के दौरान युवकों ने पुलिस पर 22 राउंड फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई। उस कार्रवाई में तत्कालीन थानेदार राजेश कुमार शर्मा भी शामिल थे।
मामला तूल पकड़ने पर सीआईडी जांच कराई गई और पुलिसकर्मियों को क्लीन चिट दे दी गई। हालांकि बाद में मामला मानवाधिकार आयोग पहुंचा, जहां पुलिस की कहानी पर कई गंभीर सवाल उठे। जांच के दौरान पुलिसकर्मियों के बयान आपस में मेल नहीं खाए। एक अधिकारी ने कहा कि युवकों ने पहले फायरिंग की, जबकि पुलिस वाहन चालक ने अलग बयान दिया। कथित तौर पर बरामद हथियारों से मृतकों के फिंगरप्रिंट नहीं मिले। घटनास्थल और पोस्टमॉर्टम से जुड़े कई तथ्यों पर भी सवाल उठे, लेकिन इसके बावजूद मामला आगे नहीं बढ़ सका।
एक मां का आरोप
मनीष महिवाल की मां अनिता देवी आज भी उस घटना को न्याय की अधूरी लड़ाई बताती हैं। उनका आरोप है कि पुलिस उनके 17 वर्षीय बेटे को पूछताछ के नाम पर घर से ले गई और अगले दिन उसे मुठभेड़ में मारा गया घोषित कर दिया गया। अनिता देवी का कहना है कि उन्हें आज तक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं मिली और न्याय की मांग करने पर धमकियां भी दी गईं। उनका दावा है कि मामला वर्षों से अदालत में लंबित है। वह राजेश शर्मा का नाम लेकर कहती हैं की अगर उस समय राजेश को सीनियर अधिकारियों ने नहीं बचाया होता तो आज भोजपुर में भरत भूषण तिवारी को फर्जी मुठभेड़ में मारा नहीं जाता।
फिर विवादों में राजेश शर्मा
2007 के विवाद के बावजूद राजेश कुमार शर्मा का पुलिस सेवा में प्रमोशन होता रहा और वह एसडीपीओ बने। अब भोजपुर के भरत भूषण तिवारी कथित एनकाउंटर मामले में उनका नाम फिर सुर्खियों में है। 17 जून को शाहपुर थाना क्षेत्र में हुए इस एनकाउंटर के बाद भरत तिवारी की मां आशा देवी की शिकायत पर शाहपुर थाने में हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। एफआईआर में तत्कालीन एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा, तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेश मालाकार (जो बाद में निलंबित हुए) और अन्य पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया है। परिजनों का आरोप है कि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर हथियार फेंक दिया था, इसके बावजूद पुलिस ने उसे गोली मार दी। जबकि पुलिस का दावा है कि वह मुठभेड़ में मारा गया। मामले की जांच अभी जारी है।
फिर नई पोस्टिंग, उठ रहे सवाल
भरत तिवारी मामले में नाम आने के बाद राजेश कुमार शर्मा को पहले पुलिस मुख्यालय से संबद्ध किया गया था। अब उनका मद्यनिषेध विभाग में तबादला कर दिया गया है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या हत्या जैसे गंभीर आरोपों और जांच लंबित रहने के बावजूद नई पोस्टिंग दिया जाना उचित है?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एफआईआर दर्ज होने से किसी अधिकारी की सेवा स्वतः समाप्त नहीं होती और न ही पोस्टिंग पर रोक लगती है। यदि अधिकारी निलंबित नहीं है तो सरकार सेवा नियमों के तहत उसका तबादला या नई तैनाती कर सकती है। कई मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों को मूल पद से हटाकर दूसरे विभाग में भेजा जाता है। फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है। मुजफ्फरपुर के चर्चित एनकाउंटर से लेकर भोजपुर के भरत तिवारी एनकाउंटर तक, हर बड़े विवाद में राजेश शर्मा का नाम सामने आने के बावजूद उन्हें लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहीं। ऐसे में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि आखिर राजेश शर्मा पर यह मेहरबानी क्यों?