बिहार में शराबबंदी के 10 साल: 5 महीनों में जब्त हुई 141 करोड़ की शराब 11% का उछाल,खजाने को 30,000 करोड़ का नुकसान, जमकर बिक रही अवैध शराब,पढ़ें इनसाइड रिपोर्ट

बिहार पुलिस ने बताया कि उसने साल 2026 में जनवरी से मई तक 141 करोड़ रुपये कीमत की 17.5 लाख लीटर से ज्यादा शराब जब्त की.इसमें 8,01,537 लीटर देसी और 9,51,796 लीटर इंडियन मेड फॉरेन लिकर के आंकड़े हैं.पुलिस ने हर महीने औसतन 3,50,677 लीटर शराब पकडती है

Bihar liquor ban 10 years report
2026 में शराब जब्ती में 11% का उछाल, अदालतों पर बढ़ा मुकदमों का बोझ- फोटो : news 4 nation AI

नीतीश कुमार की सरकार ने साल 2016 में महिलाओं की मांग पर सूबे  में पूर्ण शराबबंदी का ऐतिहासिक फैसला लिया था। उम्मीद थी कि इससे घरेलू हिंसा, पैसों की बर्बादी और शराबी पतियों से मुक्ति मिलेगी, लेकिन धरातल पर अब भी शराब की अवैध आवक जारी है। बिहार पुलिस द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 के शुरुआती 5 महीनों (जनवरी से मई) में ही शराब जब्ती के मामलों में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पुलिस ने इस अवधि में करीब 141 करोड़ रुपये मूल्य की 17.5 लाख लीटर से अधिक अवैध शराब जब्त की है, जिसमें 8.01 लाख लीटर देसी और 9.51 लाख लीटर विदेशी शराब (IMFL) शामिल है।


गिरफ्तारियों का रिकॉर्ड और पिछले साल से तुलना

राज्य में शराबबंदी कानून को सख्ती से लागू करने के लिए पुलिस लगातार अभियान चला रही है। साल 2026 के इन 5 महीनों में कुल 56,904 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें से 19,877 लोग शराब की तस्करी व सप्लाई में शामिल थे, जबकि 37,027 लोग शराब पीने के आरोप में पकड़े गए। अगर इसकी तुलना साल 2025 की समान अवधि से करें, तो पिछले साल जनवरी से मई के बीच 15.73 लाख लीटर शराब पकड़ी गई थी। पुलिस का कहना है कि जब्ती के आंकड़ों में यह 11% का उछाल राज्य भर में बढ़ाई गई निगरानी और सख्ती का नतीजा है।


राजस्व को बड़ा झटका: 10 वर्षों में 30 हजार करोड़ का नुकसान

एक तरफ जहां अवैध शराब की धरपकड़ जारी है, वहीं दूसरी तरफ शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को अपने राजस्व में भारी वित्तीय घाटा उठाना पड़ रहा है। PRS लेजिस्लेटिव की बजट एनालिसिस रिपोर्ट के मुताबिक, शराबबंदी से पहले (2015-16) राज्य सरकार को शराब पर टैक्स से 3,142 करोड़ रुपये की कमाई होती थी, जो 2016-17 में घटकर महज 30 करोड़ रह गई। अनुमानों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में बिहार को शराबबंदी के कारण 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के राजस्व का नुकसान हुआ है, जो राज्य की अपनी टैक्स कमाई का एक बड़ा हिस्सा (करीब 15 प्रतिशत) हुआ करता था।


बजटीय गणित गड़बड़ाया: राजकोषीय और राजस्व घाटे की चुनौती

शराबबंदी के वित्तीय प्रभाव के कारण बिहार का बजटीय संतुलन भी प्रभावित दिख रहा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में राजकोषीय घाटे को सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार इसके 11.8 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। इसके अलावा, जहां सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 1,143 करोड़ रुपये के राजस्व सरप्लस का अनुमान लगाया था, वहीं नए आर्थिक विश्लेषणों के मुताबिक राज्य को 76,315 करोड़ रुपये का बड़ा राजस्व घाटा (जीएसडीपी का 6.7 प्रतिशत) झेलना पड़ सकता है।


अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ: दम घुटने जैसी स्थिति

शराबबंदी से जुड़े लाखों मामलों के कारण बिहार की न्यायिक व्यवस्था पर दबाव अत्यधिक बढ़ गया है। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने भी टिप्पणी करते हुए कहा था कि शराबबंदी के मामलों ने बिहार की अदालतों का दम घोंट रखा है और पटना हाईकोर्ट के नियमित कामकाज को प्रभावित किया है। वर्तमान में राज्य की अदालतों में 63 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 37 लाख से ज्यादा मामले निचली अदालतों में हैं। 27 अप्रैल 2026 को जारी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में शराबबंदी कानून के तहत 17.18 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 4.83 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई है, जिससे मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है।


पड़ोसी राज्यों और नेपाल की सीमाओं से मिल रही चुनौती

बिहार में शराबबंदी को पूरी तरह सफल बनाने के आड़े यहाँ की भौगोलिक सीमाएं आ रही हैं। बिहार के पड़ोसी राज्यों जैसे झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और मित्र देश नेपाल में शराब पर कोई पाबंदी नहीं है। पुलिस की कार्रवाई में यह बात सामने आई है कि अधिकांश अवैध शराब इन्हीं सीमावर्ती इलाकों और नेपाल के रास्तों से तस्करी कर बिहार में एंट्री कर रही है। सीमाओं पर मजबूत नेटवर्क और अवैध सप्लायर्स के कारण बिहार का यह ड्रीम प्रोजेक्ट जमीनी स्तर पर पूरी तरह से मुस्तैद होने के बावजूद चुनौतियों से जूझ रहा है।