बिहार में MLA-MLC फंड पर लगा ब्रेक! 45 योजनाओं की बेड़ियों में फंसा 1272 करोड़, लगातार गिरा खर्च

Bihar MLA Fund: बिहार के गांव अब सिर्फ सड़क और नाली नहीं, बल्कि शहरों जैसी आधुनिक सुविधाएं मांग रहे हैं।

Bihar MLA MLC Fund Stuck
बिहार में MLA-MLC फंड पर लगा ब्रेक! - फोटो : social Media

Bihar MLA Fund: बिहार के गांव अब सिर्फ सड़क और नाली नहीं, बल्कि शहरों जैसी आधुनिक सुविधाएं मांग रहे हैं। कहीं ग्रामीण हाई मास्ट लाइट की मांग कर रहे हैं तो कहीं सीसीटीवी कैमरे, कंप्यूटर, ओपन जिम, स्पोर्ट्स किट, पेयजल व्यवस्था और कब्रिस्तान की घेराबंदी की जरूरत सामने आ रही है। लेकिन ग्रामीणों की बदलती जरूरतों और मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के मौजूदा नियमों के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।

राज्य के 243 विधायक और 75 विधान परिषद सदस्य अपने क्षेत्र के विकास के लिए हर साल मिलने वाली राशि का इस्तेमाल सिर्फ निर्धारित 45 तरह की योजनाओं में ही कर सकते हैं। यही पाबंदी स्थानीय जरूरत के मुताबिक योजनाओं के चयन में बड़ी बाधा बन रही है। नतीजा यह कि विधायक निधि की राशि खर्च होने का औसत लगातार नीचे जा रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023-24 में 90.62 फीसदी राशि खर्च हुई थी। 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 85.69 फीसदी रह गया, जबकि 2025-26 में महज 81.61 फीसदी राशि ही खर्च हो सकी। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के शुरुआती तीन महीनों में अब तक करीब 20 फीसदी राशि ही खर्च हो पाई है।मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत सालाना करीब 1272 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध होती है। ऐसे में नियमों की सख्ती के कारण बड़ी रकम का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाना विकास की रफ्तार के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।

विधायकों की ओर से अब एमपी फंड की तर्ज पर नियमों में बदलाव की मांग तेज हो रही है। एमपी फंड में प्राथमिकता के 12 व्यापक क्षेत्रों के तहत कई तरह के विकास कार्य कराए जा सकते हैं। मॉनसून सत्र में विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने भी सरकार से सवाल किया कि राज्य में एमपी फंड की तर्ज पर व्यवस्था लागू करने में क्या परेशानी है।नियमों में ढील मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी वास्तविक जरूरत के मुताबिक टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियां तैयार की जा सकती हैं।

महंगी निर्माण सामग्री और बढ़ती विकास जरूरतों को देखते हुए दो दर्जन से अधिक विधायक विधायक निधि को मौजूदा 4 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 6 से 8 करोड़ रुपये करने की मांग कर चुके हैं। इसके साथ ही स्थानीय जरूरत के हिसाब से राशि खर्च करने के लिए अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने की मांग भी उठ रही है।

मौजूदा पाबंदियों के कारण कई ऐसी योजनाएं हैं, जिन्हें एमपी फंड से कराया जा सकता है, लेकिन विधायक निधि से नहीं। इनमें ट्यूबवेल और आरओ प्लांट, सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर व आईटी उपकरण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सार्वजनिक शौचालय, ग्रामीण सोलर लाइट, स्ट्रीट लाइट, सोलर पावर प्लांट, वर्षा जल संचयन, छोटे तालाबों का जीर्णोद्धार, ओपन जिम, स्पोर्ट्स उपकरण, सीसीटीवी कैमरे, श्मशान-कब्रिस्तान की घेराबंदी और किसानों के लिए बड़े वेइंग मशीन जैसी योजनाएं शामिल हैं।

अब सवाल यह है कि जब गांवों की जरूरतें तेजी से बदल रही हैं, तो क्या विधायक निधि के नियम भी वक्त के साथ बदलेंगे? अगर नियमों में लचीलापन आता है तो विधायकों के पास स्थानीय जरूरत के मुताबिक योजनाएं चुनने की अधिक आजादी होगी और वर्षों से विकास की बाट जोह रहे गांवों में बुनियादी सुविधाओं के साथ आधुनिक सामुदायिक संसाधन भी तेजी से विकसित किए जा सकेंगे।