सीबीआई जांच या फाइलों में दफन इंसाफ? बिहार के वो 10 हाई-प्रोफाइल केस जिनकी 'फाइनल रिपोर्ट' ने खड़े किए बड़े सवाल
बिहार में जब भी कोई पेचीदा या हाई-प्रोफाइल मामला सामने आता है, तो न्याय की अंतिम उम्मीद 'सीबीआई' (CBI) पर आकर टिक जाती है। लेकिन पिछले तीन दशकों का इतिहास गवाह है कि कई बार इस 'सुप्रीम' एजेंसी की जांच भी विवादों के घेरे में रही है।
Patna - बिहार में पिछले तीन दशकों के दौरान कई ऐसे हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, जिनकी गूंज देश भर में सुनाई दी। न्याय की उम्मीद में इन मामलों की जांच राज्य पुलिस से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई, लेकिन कई बार सीबीआई की अंतिम रिपोर्टों ने नए विवादों को जन्म दिया या मामले सालों तक ठंडे बस्ते में पड़े रहे।
यहाँ पिछले 30 वर्षों के बिहार से जुड़े 10 बड़े मामले दिए गए हैं, जिन पर सीबीआई की जांच या तो अधूरी रही या उनकी रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठे:
1. शिल्पी-गौतम कांड (1999): 'सुसाइड' की रिपोर्ट पर बवाल

3 जुलाई 1999 को पटना के फ्रेजर रोड पर एक गैराज में खड़ी कार के अंदर शिल्पी गौतम और गौतम सिंह के शव बरामद हुए थे। सीबीआई ने इस मामले को 'आत्महत्या' (Suicide Pact) करार देते हुए बंद कर दिया, जबकि डीएनए जांच में दुष्कर्म की पुष्टि की खबरें आई थीं। राजनीतिक रसूख और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों के कारण सीबीआई की रिपोर्ट आज भी विवादित मानी जाती है।
2. नवरुणा चक्रवर्ती अपहरण कांड (2012): 13 साल बाद भी अनसुलझी पहेली

मुजफ्फरपुर की 12 वर्षीय नवरुणा का उसके घर से अपहरण कर लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने जांच संभाली, लेकिन 13 साल बीत जाने के बाद भी एजेंसी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी। भू-माफियाओं के हाथ होने के शक के बावजूद सीबीआई ने अंततः साक्ष्यों के अभाव में केस बंद करने की कोशिश की, जिस पर परिजनों ने कड़ा ऐतराज जताया था।
3. खुशी अपहरण कांड (मुजफ्फरपुर): 5 साल बाद भी सुराग नहीं

मुजफ्फरपुर की 6 साल की बच्ची खुशी के गायब होने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी थी। बिहार पुलिस की विफलता के बाद उम्मीद थी कि सीबीआई बच्ची को ढूंढ निकालेगी, लेकिन करीब 5 साल बीत जाने के बाद भी जांच एजेंसी के हाथ खाली हैं।
4. सत्येंद्र दुबे हत्याकांड (2003): 'ह्विसलब्लोअर' की हत्या पर सवाल

स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना में भ्रष्टाचार उजागर करने वाले इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की गया में हत्या कर दी गई थी। सीबीआई ने इस मामले को साधारण 'लूटपाट के दौरान हत्या' का रूप देकर चार्जशीट दाखिल की, जबकि व्यापक स्तर पर यह माना गया कि यह बड़े ठेकेदारों और अधिकारियों द्वारा कराई गई टारगेट किलिंग थी।
5. बॉबी मर्डर केस (1983/90 के दशक तक चर्चा): राजनीतिक प्रभाव का साया

बिहार विधानसभा की कर्मचारी 'बॉबी' की संदिग्ध मौत ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था। राज्य पुलिस की जांच काफी आगे बढ़ चुकी थी, लेकिन सीबीआई को केस मिलते ही जांच की दिशा बदल गई। अंततः ठोस निष्कर्ष पर पहुँचे बिना ही इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जिसे 'पॉलिटिकल फियास्को' माना जाता है।
6. योगेंद्र पांडेय संदिग्ध मौत (2009): हत्या या आत्महत्या?
पथ निर्माण विभाग के इंजीनियर योगेंद्र पांडेय की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। सीबीआई ने अपनी जांच के बाद इसे 'आत्महत्या' बताकर केस बंद कर दिया, जबकि पीड़ित परिवार ने हत्या का दावा करते हुए रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए थे।
7. बिटुमेन (अलकतरा) घोटाला (1996): दशकों तक खिंची जांच
सड़कों के निर्माण के लिए खरीदे गए अलकतरे में हुए करोड़ों के इस घोटाले की जांच सीबीआई ने 1997 में शुरू की थी। हालांकि इसमें कुछ सजाएं हाल ही में (2025 में) हुई हैं, लेकिन दशकों तक जांच की धीमी रफ्तार और कई मुख्य आरोपियों के बाहर रहने पर सवाल उठते रहे हैं।
8. मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड (2018): मुख्य दोषियों पर संशय

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की रिपोर्ट के बाद उजागर हुए इस भयावह कांड की जांच सीबीआई ने की। हालांकि ब्रजेश ठाकुर समेत कई को सजा हुई, लेकिन विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप था कि जांच ने उन 'सफेदपोश' नेताओं और अधिकारियों को बचा लिया जिनके संरक्षण में यह खेल चल रहा था।
9. चंपा विश्वास कांड: सत्ता और रसूख की लड़ाई

एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की पत्नी चंपा विश्वास के उत्पीड़न का मामला जब सीबीआई के पास गया, तो इसमें भी जांच की प्रक्रिया और राजनीतिक दबाव को लेकर काफी चर्चा हुई। यह केस बिहार में 'सेक्स, पावर और क्राइम' के गठजोड़ का प्रतीक बन गया था।
10. पटना नीट छात्रा संदिग्ध मौत (2026): ताज़ा चुनौती
हाल ही में (जनवरी 2026) पटना में एक नीट छात्रा की मौत का मामला सीबीआई को सौंपा गया है। जहाँ पुलिस इसे 'आत्महत्या' बता रही है, वहीं परिवार और विपक्ष का आरोप है कि साक्ष्यों को मिटाया गया है। सीबीआई के लिए यह मामला अपनी साख बचाने की एक नई चुनौती है।