SC Verdict On Attempt To Rape: सलवार उतारने, सीना दबाने की कोशिश रेप नहीं,पटना HC के विवादित फैसले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, CJI सूर्यकांत की तल्ख़ टिप्पणी-फैसला लिखने से पहले कुछ रिसर्च करें जज

SC Verdict On Attempt To Rape: महिलाओं से जुड़े लैंगिक अपराधों में अदालतों के दृष्टिकोण और न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने बेहद सख़्त और नाराज रुख़ अख्तियार किया है।

HC Verdict On Attempt To Rape press the chest
सलवार उतारने, सीना दबाने की कोशिश रेप नहीं पर भड़के CJI- फोटो : social Media

SC Verdict On Attempt To Rape:  महिलाओं से जुड़े लैंगिक अपराधों में अदालतों के दृष्टिकोण और न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत  ने बेहद सख़्त और नाराज रुख़ अख्तियार किया है। पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले, जिसमें कहा गया था कि महिला की छाती दबाना या सलवार उतारने की कोशिश करना बलात्कार का प्रयास नहीं है, पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गहरी हैरत और कड़ी आपत्ति जताई है। शीर्ष अदालत ने दो-टूक लफ़्ज़ों में न्यायिक बिरादरी को नसीहत दी है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कलम चलाने से पहले पूरी रिसर्च और संजीदगी का होना लाज़मी है।

सामाजिक संगठनों द्वारा कानून-व्यवस्था और आधी आबादी की सुरक्षा को लेकर सरकार व तंत्र पर लगातार दागे जा रहे सियासी तीरों के बीच सुप्रीम कोर्ट का यह रुख़ बेहद अहम है। सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि बीते साल मार्च में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी नाबालिग का पायजामा खोलने' के मामले में ऐसी ही ओछी टिप्पणी की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लिया था। इसके बावजूद, 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने 2008 के बांका ज़िले के एक मामले में आरोपी की सज़ा को पलटते हुए इसे महज़ शालीनता भंग करने का जुर्म माना, जो खाकी और अदालत दोनों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है।

पूरा मामला बांका ज़िले के अमरपुर (2008) के एक वाकये से जुड़ा है, जहाँ एक स्टूडियो संचालक पर युवती को बंधक बनाने, उसकी छाती दबाने और सलवार उतारने की कोशिश करने का संगीन आरोप था। इस मामले की तफ़्सील में जाते हुए पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की पीठ ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि मेडिकल साक्ष्य  की कमी और प्रत्यक्ष कृत्य के अभाव में यह कृत्य महज़ आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध (अपराध की तैयारी) है, इसे कानूनी तौर पर दुष्कर्म का वास्तविक प्रयास नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट के इस तल्ख़ और तकनीकी फैसले पर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख़ अख्तियार किया। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट और इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई ऐसी ही असंवेदनशील दलीलों को सिरे से नकार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दो-टूक लफ़्ज़ों में व्यवस्था दी कि किसी महिला की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ इस हद तक जाना सिर्फ़ तैयारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर रेप की कोशिश ही माना जाएगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने अदालती अमले और पुलिसिया तंत्र की सुस्ती पर भी गहरा आक्रोश जताया। कोर्ट ने साफ़ किया कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की रिपोर्ट और अदालतों के लिए बनाई गई विशेष हैंडबुक का पालन हर हाल में होना चाहिए। राज्य सरकारों को सख्त हिदायत दी गई है कि थानों में एफआईआर दर्ज होने से लेकर चार्जशीट दाखिल होने तक जेंडर गाइडलाइंस का मुकम्मल ध्यान रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस खास रिपोर्ट को सभी हाई कोर्ट्स की वेबसाइट पर तुरंत अपलोड करने का हुक्म जारी कर यह साफ कर दिया है कि महकमे की किसी भी लापरवाही को अब बख़्शा नहीं जाएगा।