Bihar Politics: सियासी गलियारों में सन्नाटा, क्या दबाव से हुआ उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश का MLCके लिए मनोनयन, या एनडीए में अंदरूनी खलबली का है इशारा?पढ़िए पूरी कहानी
Bihar Politics: बिहार के राजनीतिक फलक पर इस वक्त एक ऐसा दृश्य उभरा है, जिसने सत्त्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। एनडीए के बड़े नेताओं की इस गैर-हाजिरी ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति की इस शतरंज में कब कौन सा मुहरा बेगाना हो जाए, कुछ कहा
Bihar Politics: बिहार के राजनीतिक फलक पर इस वक्त एक ऐसा दृश्य उभरा है, जिसने सत्त्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री दीपक प्रकाश ने विधान परिषद (MLC) के सदस्य के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। सभापति अवधेश नारायण सिंह ने उन्हें शपथ दिलाई। मगर इस समारोह की सबसे बड़ी चर्चा इसकी शून्यता और खामोशी रही, जिसने सियासी जानकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और संवैधानिक बाध्यता (अनुच्छेद 164-4) के तहत अपनी कुर्सी बचाने के लिए यह शपथ ग्रहण भले ही तकनीकी रूप से अनिवार्य था, लेकिन इसका राजनीतिक फलक कई पेचीदा सवाल छोड़ गया है। भाजपा के विधायक देवेश कुमार के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर हुए इस मनोनयन के बाद, एनडीए खेमे में जिस तरह की बेरुखी और तस्लीम-ओ-दीद (अभिवादन) की कमी दिखी, उसने कई राजनीतिक कयासों को जन्म दे दिया है।
समारोह में आरएलएम के कुछ चुनिंदा नेता जैसे प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह और माधव आनंद तो मौजूद रहे, लेकिन भाजपा की तरफ से केवल पूर्व मंत्री हरि सहनी की मौजूदगी ने गजब की दास्तां बयां की। हैरान करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, उपमुख्यमंत्री समेत सत्ता पक्ष का कोई भी शीर्ष दिग्गज इस मजलिस से नदारद नजर आया।
सियासत की इस बिसात पर यह खामोशी गहरी तस्दीक करती है। चंद महीनों पहले हुए अन्य शपथ ग्रहण समारोहों का मंजर इससे बिल्कुल जुदा था। जुलाई 2026 के भव्य समारोह और मई 2026 में आरजेडी के नवनिर्वाचित एमएलसी सोनू कुमार राय के शपथ ग्रहण में खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की मौजूदगी और मंच की गर्मजोशी ने एकता का पैगाम दिया था। तब सत्ता और विपक्ष के बीच एक इत्तेफाकन नजारा भी देखने को मिला था।
इसके बरक्स, दीपक प्रकाश का यह शपथ ग्रहण एक तन्हा और बेगाना सफर जैसा लगा। जून 2026 के विधान परिषद चुनावों में टिकट वितरण के दौरान हुई खींचतान और उपजे रोष के जख्म शायद अभी भी हरे हैं। क्या यह मनोनयन और शपथ ग्रहण महज एक मजबूरी थी? क्या एनडीए के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल क्या यह फैसला बेमन से लिया गया था?
फिलहाल, इन सवालों के साए में बिहार की सियासत सुलग रही है। एनडीए के बड़े नेताओं की इस गैर-हाजिरी ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति की इस शतरंज में कब कौन सा मुहरा बेगाना हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।