Dr. Syama Prasad Mukherjee Jayanti 2026: दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे...125वीं जयंती विशेष- डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, संघर्ष और बलिदान की पूरी कहानी

Dr. Syama Prasad Mukherjee Jayanti 2026: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिर्फ़ एक राजनेता नहीं, बल्कि उस सोच-विचार चिंतन के प्रतिनिधि थे, जो मुल्क की एकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि मानती थी....

Dr Syama Prasad Mookerjee Legacy of Unity and Sacrifice
विचार, विरासत और राष्ट्रवाद की अमिट पहचान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी- फोटो : social Media

Dr. Syama Prasad Mukherjee Jayanti 2026: 6 जुलाई की तारीख हिंदुस्तान की तारीख में एक ऐसी शख्सियत की पैदाइश का दिन है, जिसने ज्ञान, सियासत और राष्ट्रसेवा तीनों मैदानों में अपनी अलग पहचान कायम की। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिर्फ़ एक राजनेता नहीं, बल्कि उस सोच-विचार चिंतन के प्रतिनिधि थे, जो मुल्क की एकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि मानती थी। उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया और हर चुनौती का डटकर सामना किया। उनकी ज़िंदगी संघर्ष, त्याग, साहस और वतनपरस्ती की ऐसी दास्तान है, जो आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है। उनकी 125वीं जयंती पर उनके जीवन, विचारों और योगदान को याद करना राष्ट्र के प्रति सम्मान प्रकट करने का अवसर है।

आज 6 जुलाई है। यह तारीख भारत के इतिहास में एक ऐसे महान व्यक्तित्व की जयंती के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए न केवल बौद्धिक संघर्ष किया, बल्कि अंतिम सांस तक राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक अखंडता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी – या श्यामाप्रसाद मुकर्जी – नाम सुनते ही मन में एक ऐसी छवि उभरती है, जो बंगाल की धरती से उठकर पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली थी। वे शिक्षाविद्, वकील, राजनेता, विचारक और सबसे बढ़कर एक अग्निधर्मा राष्ट्रभक्त थे। आज जब हम 125वीं जयंती मना रहे हैं, तो उनके जीवन की हर घटना, हर संघर्ष और हर बलिदान हमें याद दिलाता है कि भारत की एकता कोई समझौता नहीं, बल्कि अटूट सिद्धांत है। उनका नारा – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” – आज भी गूंजता है, खासकर जब अनुच्छेद 370 को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाया गया। यह उनके सपने की पूर्ति थी। आइए, विस्तार से जानते हैं इस महान विभूति के जीवन की कहानी – बचपन से लेकर शहादत तक, उनके विचारों से लेकर विरासत तक। यह आलेख न सिर्फ जीवनी है, बल्कि एक राष्ट्र के आत्म-चिंतन का दर्पण भी है।

प्रारंभिक जीवन और परिवार की विरासत

6 जुलाई 1901 को कलकत्ता (आज का कोलकाता) के भवानीपुर इलाके में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ। यह बंगाल की उस धरती पर हुआ, जिसने स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, राजा राम मोहन राय और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुष दिए। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल के “बाघ” के नाम से मशहूर थे – कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश, कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति और गणित के विश्वप्रसिद्ध विद्वान। माता जोगमाया देवी एक धर्मपरायण और संस्कारवान महिला थीं। परिवार ब्राह्मण था, उनका संस्कार ज्ञान, सेवा और राष्ट्रभक्ति का था। दादा गंगाप्रसाद मुखोपाध्याय कलकत्ता आए थे और रामायण का बांग्ला अनुवाद करने वाले पहले व्यक्ति माने जाते हैं। श्यामा प्रसाद के भाई उमा प्रसाद मुखोपाध्याय हिमालय प्रेमी और लेखक थे। पिता की मृत्यु 1924 में हुई, जिसने युवा श्यामा प्रसाद पर गहरा असर डाला। उन्होंने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया – विद्या, निष्ठा और निर्भीकता। बचपन से ही वे मेधावी थे। मित्रा इंस्टीट्यूशन से पढ़ाई शुरू की, 1914 में मैट्रिक पास किया। प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी में बीए प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया (1921)। फिर बांग्ला में एमए प्रथम श्रेणी (1923) और एलएलबी (1924)। 1926 में इंग्लैंड गए और लिंकन इन से बैरिस्टर की उपाधि ली (1927)। उनका विवाह 1922 में सुधा देवी से हुआ। सुधा देवी 1933 में डबल निमोनिया से गुजर गईं। उनके पांच बच्चे थे – अनुतोष, देवतोष, सबिता, आरती आदि। श्यामा प्रसाद ने पुनर्विवाह नहीं किया। पारिवारिक जीवन में भी उन्होंने त्याग और अनुशासन का उदाहरण पेश किया।

शैक्षणिक उत्कर्ष सबसे युवा कुलपति

 शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. मुखर्जी की उपलब्धियां अविस्मरणीय हैं। मात्र 33 वर्ष की आयु में 8 अगस्त 1934 को वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने (1934-1938)। यह उपलब्धि आज भी रिकॉर्ड है। उनके कार्यकाल में कई क्रांतिकारी बदलाव हुए। रवींद्रनाथ ठाकुर ने पहली बार बांग्ला में दीक्षांत भाषण दिया। भारतीय भाषाओं को उच्च परीक्षाओं में शामिल किया गया। उन्होंने विश्वविद्यालय को सिर्फ डिग्री देने वाली मशीन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का केंद्र बनाया। 1938 में उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि मिली। 1945 में उन्होंने श्यामाप्रसाद कॉलेज की स्थापना की। महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम से बौद्ध भिक्षु भगवान बुद्ध के शिषअय सारिपुत्र और मौद्गल्यायन के अवशेष भारत लाए (1942)। बाद में इन्हें सांची स्तूप में स्थापित किया गया। यह उनकी सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी निष्ठा का प्रमाण था। शिक्षा पर उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं – “जिस काम को भी आप करें, उसे गंभीरता से, पूर्णता से और अच्छी तरह से करें। उसे अधूरा कभी न छोड़ें। अनुशासन और सहनशीलता की आदत डालें।”

राजनीति में प्रवेश – बंगाल की मिट्टी से राष्ट्र की पुकार

1929 में वे बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए (कलकत्ता विश्वविद्यालय)। शुरू में कांग्रेस से जुड़े, लेकिन 1930 में कांग्रेस के बहिष्कार के बाद स्वतंत्र उम्मीदवार बने। 1937 के प्रांतीय चुनावों में भी स्वतंत्र रूप से लड़े। 1941-42 में ए.के. फजलुल हक की प्रगतिशील गठबंधन सरकार में वे बंगाल के वित्त मंत्री बने। गौररतलब है कि ए.के. फजलुल हक ने दिसंबर 1941 में मुस्लिम लीग से अलग होकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी (हिंदू महासभा) और फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ मिलकर 'प्रगतिशील गठबंधन सरकार' (Progressive Coalition) का गठन किया। 'शेर-ए-बंगला' के नाम से मशहूर फजलुल हक इस सरकार के मुख्यमंत्री बने और श्यामा प्रसाद मुखर्जी वित्त मंत्री बनाए गए। लेकिन 20 नवंबर 1942 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कारण था – ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां, खासकर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान। उन्होंने कहा कि प्रशासन को जनता का विश्वास जीतना चाहिए, न कि दमन करना। वे भारत छोड़ो आंदोलन के विरोधी नहीं थे, बल्कि व्यावहारिक थे। बंगाल में अकाल और अराजकता से बचने के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन, महाबोधि सोसाइटी और मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी के साथ मिलकर राहत कार्य चलाए।

हिंदू महासभा और बंगाल विभाजन का संघर्ष

1939 में वे हिंदू महासभा से जुड़े। 1943 से 1946 तक अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने हिंदू हितों की पुरजोर वकालत की। 1946 के नोआखाली नरसंहार के बाद पूर्वी बंगाल के हिंदुओं की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता बन गई। 1947 में उन्होंने बंगाल के विभाजन की मांग की – ताकि पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न अंग रहे। उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन को पत्र लिखा कि बंगाल का विभाजन जरूरी है, भले ही भारत का न हो। एकीकृत स्वतंत्र बंगाल के प्रस्ताव (शरत बोस और सुहरावर्दी द्वरा यह प्रस्ताव लाया गया था) का उन्होंने कड़ा विरोध किया। यह उनकी राष्ट्रीय एकता की प्रतिबद्धता थी – बंगाल को पाकिस्तान में जाने से बचाना।

स्वतंत्र भारत में मंत्री पद और इस्तीफा

15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में वे उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। गौरतलब है कि नेहरू की अंतरिम मंत्रिमंडल में डॉ श्यामा प्रसाद मुख्रजी को शामिल करने की सलाह नेहरू जी को महात्मा गांधी ने दिया था।  उन्होंने औद्योगिक विकास, लघु उद्योगों को बढ़ावा और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। नेहरू-लियाकत समझौते (दिल्ली पैक्ट) के विरोध में लेकिन 8 अप्रैल 1950 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। समझौते में पूर्वी पाकिस्तान (पूर्वी बंगाल) के हिंदुओं की सुरक्षा की गारंटी कमजोर थी। उन्होंने कोलकाता की रैली में कहा कि जनसंख्या और संपत्ति का आदान-प्रदान ही एकमात्र समाधान है। के.सी. नेगी के साथ उन्होंने इस्तीफा दिया। गौरतलब है कि के सी नेगी कांग्रेस पार्टी के थे और ढाका ग्रामीण के प्रतिनिधि थे।  यह उनकी सिद्धांतनिष्ठा का प्रमाण था।

भारतीय जनसंघ की स्थापना – राष्ट्रवादी विकल्प का जन्म

इस्तीफे के बाद उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी मंच बनाने का फैसला किया। 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सहयोग से भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। प्रतीक था – दीपक (ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक)। वे पहले अध्यक्ष बने। जनसंघ का मूल मंत्र था – सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता, मजबूत रक्षा और भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान। 1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ ने तीन सीटें जीतीं, जिसमें डॉ. मुखर्जी दक्षिण कोलकाता से चुने गए। उनके भाषणों में राष्ट्रवाद की झलक मिलती थी – संसद में उनके दिये गये भाषणों में से एक पंक्ति आज भी राष्ट्रवादियों की जुबां पर होती है, वो पंक्ति है “एक राष्ट्र जो अपने अतीत की उपलब्धियों पर गर्व नहीं करता, वह भविष्य नहीं बना सकता।”

कश्मीर का अभियान और शहादत – “एक देश, एक विधान”

जनसंघ का सबसे बड़ा मुद्दा था जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण। अनुच्छेद 370, अलग संविधान, अलग झंडा और परमिट व्यवस्था का उन्होंने कड़ा विरोध किया। उनका ऐतिहासिक नारा गूंजा - “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” 26 जून 1952 को लोकसभा में उन्होंने इसे “भारत का बाल्कनीकरण” बताया। उन्होंने जम्मू प्रजा परिषद और हिंदू महासभा के साथ सत्याग्रह शुरू किया। 8 मई 1953 को वे कश्मीर की ओर कूच किए। 11 मई 1953 को लखनपुर सीमा पर बिना परमिट प्रवेश करने पर जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें श्रीनगर में हिरासत में रखा गया। 19-20 जून 1953 को उनकी तबीयत बिगड़ी – पीठ दर्द, बुखार। 22 जून को दिल में दर्द। 23 जून 1953 को सुबह 3:40 बजे श्रीनगर अस्पताल में उनका निधन हो गया। आधिकारिक कारण – हार्ट अटैक। लेकिन मौत रहस्यमय बनी रही। मां जोगमाया देवी ने नेहरू को पत्र लिखकर स्वतंत्र जांच की मांग की। नेहरू ने इनकार कर दिया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत को अटल बिहारी वाजपेयी ने 2004 में “नेहरू षड्यंत्र” बताया। देश की जनता डॉ मुखर्जी की मृत्यु को बलिदान मानती है। उनकी रहस्यमयी मौत के बाद पूरे देश में शोक और आक्रोश की लहर दौड़ी। कलकत्ता से दिल्ली तक जुलूस निकले। उनकी मृत्यु ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दिया।

विचारधारा और विरासत

डॉ. मुखर्जी हिंदुत्व के आधुनिक प्रवर्तक माने जाते हैं, लेकिन वे उदार और समावेशी थे। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्षधर थे – “भारत का गौरव उसकी आध्यात्मिक महानता, सत्य और दुखी मानवता की सेवा में निहित है।” वे आत्मनिर्भरता, मजबूत रक्षा, शिक्षा के भारतीयकरण और राष्ट्रीय एकता के प्रबल समर्थक थे। जनसंघ के माध्यम से उन्होंने कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी।

विरासत : जनसंघ आज की भाजपा का वैचारिक पूर्वज है।

5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 निरस्त होना उनके सपने की पूर्ति। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट का नाम उनके नाम पर रखा। आज भी भाजपा कार्यालयों में उनकी तस्वीर अटल बिहारी वाजपेयी और दीनदयाल उपाध्याय के साथ शोभायमान है।उनके बलिदान ने हजारों युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित किया।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन त्याग, निष्ठा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। उन्होंने साबित किया कि सच्चा नेता वही है जो सिद्धांतों पर अडिग रहे, भले ही सत्ता का त्याग करना पड़े। आज जब भारत विकसित राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है, जब एकता और अखंडता को चुनौतियां मिल रही हैं, तब उनके विचार और बलिदान हमें मार्गदर्शन देते हैं। “हम उन्नति करेंगे, हम एक होंगे” – उनका यह संकल्प आज भी प्रासंगिक है। उनकी जयंती पर हम सबको संकल्प लेना चाहिए – उनके सपनों का भारत बनाने का। राष्ट्रवाद, त्याग और जनसेवा का यह प्रतीक हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा।

बहरहाल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन उस अडिग जज़्बे, उसूलों और वतनपरस्ती की मिसाल है, जिसने भारतीय राजनीति और राष्ट्रीय चिंतन को नई दिशा दी। शिक्षा, समाजसेवा और सियासत हर क्षेत्र में उनका योगदान आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उनके विचार, संघर्ष और बलिदान यह पैगाम देते हैं कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान सर्वोपरि हैं। उनकी 125वीं जयंती केवल एक स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी क्षण है। उनके आदर्श हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देते हैं कि एक सशक्त, समरस, आत्मनिर्भर और अखंड भारत के निर्माण में हम भी अपनी सार्थक भूमिका निभाएं।

धीरेंद्र कुमार, कार्यकारी संपादक, न्यूज4नेशन की रिपोर्ट