Bihar News : पटना हाईकोर्ट से लल्लू मुखिया को नहीं मिली राहत, रिट याचिका हुई खारिज, कोर्ट ने CCA के तहत निरोध आदेश को ठहराया जायज

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने बिहारकंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट (BCCA), 2024 के तहत निवारक हिरासत में रखे गए कर्णवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को बड़ा झटका दिया है।

Bihar News : पटना हाईकोर्ट से लल्लू मुखिया को नहीं मिली राहत
लल्लू मुखिया को राहत नहीं - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना  हाईकोर्ट ने बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट, 2024 के तहत निवारक हिरासत में रखे गए कर्णवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी आपराधिक रिट याचिका को यह कहते हुए  खारिज कर दिया कि डी एम के आदेश में कोई खामी नहीं है। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने लल्लू मुखिया द्वारा इस मामले को लेकर दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने 6 अगस्त ,2026 को अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध पारित प्रारंभिक एवं बाद के निरोध आदेश में ऐसा कोई क्षेत्राधिकार संबंधी दोष, प्रक्रियात्मक अवैधता या संवैधानिक खामी नहीं है, जिसके आधार पर  हाईकोर्ट हस्तक्षेप करे। डीएम ने 10 दिसंबर, 2025 को यह आदेश  बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी की अनुशंसा पर किया था। क्योंकि उन्होंने 5 दिसंबर, 2025 को कर्णवीर सिंह यादव के विरुद्ध बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट के तहत कार्रवाई करने की अनुशंसा की थी। इसके बाद पुलिस अधिकारियों की अनुशंसा के आधार पर पटना के जिलाधिकारी ने 10 दिसंबर 2025 को बीसीसीए केस संख्या 1-09/2025 में अधिनियम की धारा 12(2) के तहत निवारक निरोध का आदेश पारित किया। इसके बाद उन्हें भागलपुर सेंट्रल जेल में रखा गया।

राज्य सरकार ने सलाहकार बोर्ड की राय के बाद निरोध की पुष्टि करते हुए उन्हें 11 दिसंबर, 2025 से 10 जून, 2026 तक हिरासत में रखने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता ने आपराधिक रिट याचिका दायर कर निरोध आदेश के साथ-साथ राज्य सरकार की मंजूरी, अपनी ओर से दिए गए अभ्यावेदन की अस्वीकृति तथा बाद में पारित निरोध आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई थी  कि जिन आपराधिक मामलों और घटनाओं को निरोध का आधार बनाया गया, वे अधिकतम सामान्य कानून-व्यवस्था से संबंधित हैं ।उनका प्रभाव इतना व्यापक नहीं है कि उन्हें सार्वजनिक व्यवस्था  के लिए खतरा माना जाए। सामान्यतः आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई के लिए पर्याप्त व्यवस्था होने के बावजूद निवारक हिरासत का सहारा लिया गया। राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए महाधिवक्ता एस डी संजय ने कहा  कि याचिकाकर्ता की आपराधिक गतिविधियों और पृष्ठभूमि के कारण स्थानीय लोगों में भय एवं असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई थी। इससे सार्वजनिक जीवन की सामान्य गति प्रभावित हुई। उन्होंने  यह भी बताया कि बाद का निरोध आदेश पहले आदेश की महज पुनरावृत्ति नहीं था, बल्कि उसके पीछे नए और स्वतंत्र तथ्य, जिनमें अतिरिक्त आरोप-पत्र भी शामिल थे, मौजूद थे।

हाईकोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रत्येक निरोध आदेश की वैधता उस समय उपलब्ध सामग्री और उस समय दर्ज की गई वैधानिक संतुष्टि के आधार पर तय की जानी चाहिए। यदि सक्षम प्राधिकारी नए एवं प्रासंगिक तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार कर कानून के अनुसार अपनी संतुष्टि दर्ज करता है, तो केवल इस आधार पर बाद के निरोध आदेश को अवैध नहीं कहा जा सकता कि पहले भी निरोध आदेश पारित किया गया था। खंडपीठ ने कर्णवीर सिंह यादव को बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट, 2024 की धारा 2(बी) के तहत ‘एंटी-सोशल एलिमेंट’ की श्रेणी में रखने की कार्रवाई को सही माना। कोर्ट ने कहा कि जिलाधिकारी के समक्ष उपलब्ध सामग्री प्रासंगिक थी। उससे धारा 12 के तहत आवश्यक  बनाने का आधार मौजूद था।याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए  आरोप भी रिकॉर्ड से साबित नहीं हुए।कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदनों पर संविधान के अनुच्छेद 22(5) तथा संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप विचार किया गया था।

खंडपीठ ने अपने 74 पृष्ठों के निर्णय के अंतिम हिस्से में कहा है कि याचिकाकर्ता की ओर से उठाई गई किसी भी चुनौती में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिससे निरोध आदेशों में क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि, प्रक्रियात्मक अवैधता या संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन साबित हो।कोर्ट ने कहा कि न तो प्रारंभिक निरोध आदेश और न ही 6 जून ,2026 का बाद का निरोध आदेश कानून की नजर में दोषपूर्ण है।