जब-जब सड़कों पर उतरे छात्र, हिल गई सरकारें! NEET आंदोलन से फिर गरमाई राजनीति, पढ़िए जब छात्रों के गुस्से ने बदली थी देश की सियासत

Student Protest: नीट पेपर लीक का मामला अब महज़ एक परीक्षा की अनियमितता नहीं, बल्कि मुल्क के नौजवानों के दिलों में उठते गुस्से और बेचैनी का आईना बन चुका है। ...

NEET Paper Leak Protest India Youth Challenge Government
NEET से निकली चिंगारी या छात्र आंदोलन का इतिहास दोहराने की तैयारी!- फोटो : social Media

Student Protest: नीट पेपर लीक का मामला अब महज़ एक परीक्षा की अनियमितता नहीं, बल्कि मुल्क के नौजवानों के दिलों में उठते गुस्से और बेचैनी का आईना बन चुका है। शिक्षा नौकरी और इंसाफ की तलाश में सड़कों पर उतरे छात्र अब एक बड़े सियासी मंजर का हिस्सा बनते दिख रहे हैं। हुकूमत की नीतियों पर सवाल, जवाबदेही की मांग और निजाम में सुधार की आवाज़ ने इस आंदोलन को नई दिशा दे दी है। तारीख गवाह है कि हिंदुस्तान में छात्रों की ताकत ने कई बार सत्ता के फैसलों को चुनौती दी और सियासत का रुख बदलने में अहम किरदार निभाया है।

नीट पेपर लीक मामले को लेकर देश के युवाओं में उबाल है. अब खबर यह नहीं रह गई है कि कहां छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। अब खबर ये है कि कहां छात्र/युवा सड़क पर नहीं उतरे। नीट पेपर लीक कांड से शुरू हुआ आंदोलन एक तरीके से अब मोदी सरकरा को निपटाने पर आमदा है। देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का ही नहीं अब कांग्रेस जैसी पार्टी केंद्रीय गृह मंत्री का इस्तीफा मांग रही है। इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अगर गृह मंत्री इस्तीफा दे दें तो प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग भी कहीं शुरू ना हो जाए। कहा जा सकता है कि आंदोलन अब अपने मील मुद्दे से निकल विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। तमाम राजनीतिक दल छात्रों /युवाओं की आड़ में अपना हित साधने में लगे हैं। ऐसा होना कोई नई और अनोखी बात नहीं है। 

देश में आजादी (1947) के बाद से लेकर अब तक छात्रों ने सरकारों की नीतियों, आर्थिक फैसलों और सामाजिक बदलावों के खिलाफ कई ऐतिहासिक आंदोलन किए हैं, जिन्होंने भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया। 

1950 और 1960 के दशक के बीच भारत में छात्रों की राजनीतिक सक्रियता मुख्यतः शिक्षा के मुद्दों, क्षेत्रीय और भाषाई पुनर्गठन, तथा खाद्यान्न संकट के इर्द-गिर्द केंद्रित रही थी। 

इस कालखंड के प्रमुख छात्र आंदोलन निम्नलिखित थे:

•    भाषावार राज्यों के गठन का आंदोलन (1950 का दशक): स्वतंत्रता के तुरंत बाद, भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग को लेकर देश भर में छात्रों ने भारी प्रदर्शन किए। विशेष रूप से ओडिशा और मद्रास प्रांत (आंध्र प्रदेश के गठन के लिए) में छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 

•    कलकत्ता ट्राम किराया वृद्धि विरोधी आंदोलन (1953): कलकत्ता (अब कोलकाता) में ट्राम का किराया बढ़ाए जाने के खिलाफ छात्रों ने बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया। ब्रिटिश स्वामित्व वाली ट्राम कंपनी द्वारा किराए में केवल 'एक पैसा' की बढ़ोतरी के खिलाफ वामपंथी दलों द्वारा किया गया एक ऐतिहासिक जन-विद्रोह था। ट्राम किराया वृद्धि में ट्राम प्रशासन और प्रदेश की कांग्रेस सरकार के बीच सहमति बन गई थी.  इस आंदोलन का नेतृत्व ज्योति बसु जैसे प्रमुख नेताओं ने किया था और यह एक महीने तक चला, जिसने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को हिलाकर रख दिया। वामपंथी दलों (जैसे कम्युनिस्ट पार्टी) ने एकजुट होकर 'ट्राम किराया वृद्धि प्रतिरोध समिति' बनाई और जनता से नारा दिया: "नया किराया मत दीजिए, लेकिन ट्राम में सफर कीजिए। ज्योति बसु और सुबोध बनर्जी सहित लगभग 600 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

गोवा मुक्ति आंदोलन (1955):  पुर्तगाली शासन से गोवा को मुक्त कराने के लिए भारत में हुआ एक ऐतिहासिक अहिंसक सत्याग्रह था। 15 अगस्त 1955 को, भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेतृत्व में हज़ारों सत्याग्रहियों ने गोवा में प्रवेश किया। पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिससे कई सत्याग्रही वीरगति को प्राप्त हुए। स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब 5,000 से अधिक निहत्थे Portuguese Quit India  के नारे लगाते हुए गोवा में घुसे, तो पुर्तगाली सेना ने क्रूरतापूर्वक गोलीबारी की। “उस दिन अनुमान के तौर पर कहा जाता है कि 51 वीरों ने बलिदान दिया और सैकड़ों घायल हुए। 1955 के इस भीषण दमन के बाद भारत सरकार पर कूटनीतिक और जन दबाव बढ़ा。 अंततः, दिसंबर 1961 में भारत सरकार द्वारा 'ऑपरेशन विजय' चलाया गया, जिसके बाद पुर्तगाली शासन समाप्त हुआ और 19 दिसंबर 1961 को गोवा को पूर्ण आज़ादी मिली

1955 का बिहार का छात्र आंदोलन... 1955 का बिहार छात्र आंदोलन, जिसे आजाद भारत का पहला छात्र आंदोलन माना जाता है, राज्य परिवहन विभाग द्वारा बस का किराया बढ़ाए जाने के विरोध में शुरू हुआ था। प्रदर्शन के दौरान पटना साइंस कॉलेज के छात्र दीनानाथ पांडे पुलिस की गोली लगने से शहीद हो गए थे।  इससे छात्र उग्र हो गए और आंदोलन पूरे पटना और बिहार में फैल गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को हस्तक्षेप करने के लिए दिल्ली से पटना आना पड़ा था और त्तकालीन परिवहन मंत्री महेश सिंह को इस्तीफा देना पड़ा था।

बंगाल खाद्यान्न आंदोलन (1959): यह आंदोलन तत्कालीन डॉ. बी.सी. रॉय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की खाद्य नीतियों, जमाखोरी और चावल की बढ़ती कीमतों के विरोध में वामपंथी दलों (भाकपा) द्वारा गठित 'मूल्य वृद्धि एवं अकाल प्रतिरोध समिति' के बैनर तले शुरू हुआ था।  पश्चिम बंगाल में गहराते खाद्यान्न संकट और कीमतों में वृद्धि के खिलाफ छात्रों ने सड़कों पर उतरकर व्यापक प्रदर्शन किया। चावल 28-30 रूपये मन बिकने लगा था। पुलिस की गोलीबारी में कई छात्रों सहित लगभग 80 लोग मारे गए थे। बंगाल में भूख और खाद्य सुरक्षा के लिए हुए इस संघर्ष को याद करते हुए हर साल 31 अगस्त को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। कोलकाता के सुबोध मल्लिक चौक पर इसकी स्मृति में एक पट्टिका भी स्थापित की गई है। 

भाषा नीति और हिंदी विरोधी आंदोलन (1965)

नीति: केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को एकमात्र अधिकारिक भाषा बनाने का फैसला।

छात्रों का आक्रोश: तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास राज्य) के छात्र इस नीति के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। छात्रों का मानना था कि इससे गैर-हिंदी भाषी युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों के अवसर खत्म हो जाएंगे। 960 के दशक में, राज्य के मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम द्वारा त्रिभाषा फॉर्मूला (अंग्रेजी, तमिल और हिंदी) लागू करने के प्रयास से तमिल राष्ट्रवादियों और छात्रों के बीच यह डर फैल गया कि हिंदी को उन पर थोपा जा रहा है। यह विरोध तब भड़का जब 26 जनवरी 1965 को, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी को देश की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाया जाना था,जिससे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी को हटाने की आशंका पैदा हो गई थी।

असर: शास्त्री के आश्वासन के बाद स्थिति शांत हुई और 1967 में संसद ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन किया,जिसने सुनिश्चित किया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा इस उग्र छात्र आंदोलन के कारण केंद्र सरकार को पीछे हटना पड़ा और आधिकारिक भाषा अधिनियम में संशोधन कर अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए सहायक आधिकारिक भाषा के रूप में बनाए रखने का आश्वासन देना पड़ा। 

 नव निर्माण आंदोलन, गुजरात (1973–1974)

नीति: बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार और हॉस्टल के भोजन बिलों में भारी बढ़ोतरी।

छात्रों का आक्रोश: गुजरात के एल डी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे गुजरात में फैल गया और इसे आम जनता का भी समर्थन मिला।

असर: छात्रों के भारी आक्रोश के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई। 

 बिहार आंदोलन / जेपी आंदोलन (1974–1975)

नीति: केंद्र और राज्य सरकार की आर्थिक नीतियां, बेरोजगारी, महंगाई और शैक्षणिक भ्रष्टाचार।

छात्रों का आक्रोश: गुजरात से प्रेरणा लेकर बिहार के छात्र संगठनों ने जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। पटना से शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे देश में कांग्रेस सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा प्रदर्शन बन गया।

असर: इसी छात्र आक्रोश और राजनीतिक अस्थिरता के बाद देश में 1975 में आपातकाल (Emergency) लागू किया गया, जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी।

असम छात्र आंदोलन (1979–1985)

नीति: सीमा पार से हो रहे अवैध प्रवासियों (विशेषकर बांग्लादेशी) को मतदाता सूची में शामिल करने और नागरिकता देने की ढीली नीति।

छात्रों का आक्रोश:  ऑल इंडिया स्टूडेंट यूनियन (AASU) के नेतृत्व में छात्रों ने राज्य की जनसांख्यिकी और संस्कृति को बचाने के लिए 6 साल तक राज्यव्यापी आंदोलन चलाया।

असर: तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को छात्रों के साथ ऐतिहासिक असाम समझौता (Assam Accord) हुआ।

मंडल आयोग विरोधी आंदोलन (1990)

नीति: तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण देने की नीति को लागू करना।

छात्रों का आक्रोश: सामान्य वर्ग के कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र इस नीति के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। दिल्ली विश्वविद्यालय सहित देश भर के कई छात्रों ने आत्मदाह तक का प्रयास किया, जिससे देश में भारी सामाजिक और राजनैतिक तनाव पैदा हो गया।

असर: इस देशव्यापी छात्र आक्रोश के कारण वी.पी. सिंह की सरकार गिर गई, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण नीति को बरकरार रखा।

. एलपीजी (LPG) सुधार और निजीकरण का विरोध (1990 का दशक)

नीति: 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद उच्च शिक्षा का बाजारीकरण और निजीकरण।

छात्रों1990 के दशक में भारत में लागू किए गए एलपीजी (LPG - उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) सुधारों का वामपंथी दलों, ट्रेड यूनियनों और कुछ स्वदेशी संगठनों द्वारा भारी विरोध किया गया। इसका मुख्य कारण सरकारी कंपनियों की बिक्री, छंटनी का डर, विदेशी पूंजी पर निर्भरता और सामाजिक असमानता में वृद्धि की आशंकाएं थीं 

छात्रों का आक्रोश: वामपंथी छात्र संगठनों (जैसे SFI और AISA) ने शिक्षा के व्यावसायीकरण और फीस वृद्धि के खिलाफ देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किए।

हालिया दशक के नीतिगत आंदोलन (2014 से 2026 तक)

नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद से भी छात्रों ने कई बड़ी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ ऐतिहासिक प्रदर्शन किए हैं:

सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) विरोध (2019-20): नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जामिया, जेएनयू और एएमयू के छात्रों का देशव्यापी आंदोलन।

अग्निवीर/अग्निपथ योजना (2022): सेना भर्ती की 4 साल की अल्पकालिक नीति के खिलाफ युवाओं और छात्रों का उग्र प्रदर्शन।

रेलवे परीक्षा (RRB NTPC) आंदोलन (2022): रेलवे भर्ती परीक्षा के नतीजों और चयन नीति में अचानक बदलाव के खिलाफ उत्तर प्रदेश और बिहार में छात्रों का आंदोलन।

नीट (NEET) और पेपर लीक विरोधी आंदोलन (2026): नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की परीक्षाओं की पारदर्शिता और पेपर लीक की राष्ट्रीय समस्या के खिलाफ जंतर-मंतर पर हालिया विशाल छात्र आक्रोश प्रदर्शन के रूप में जारी है।

बहरहाल नीट पेपर लीक का आंदोलन इस बात का सबूत है कि मुल्क का नौजवान अपने मुस्तकबिल और हक की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेगा। तारीख के पन्ने गवाह हैं कि छात्रों की आवाज़ ने कई बार हुकूमतों को फैसले बदलने पर मजबूर किया है। हालांकि, तालीम और इंसाफ के मुद्दे को सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करना लोकतंत्र के लिए मुफीद नहीं है। जरूरत इस बात की है कि निजाम में पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसा कायम किया जाए। नौजवानों का गुस्सा अगर सही दिशा पाए तो यही ताकत मुल्क की तरक्की और मजबूत जम्हूरियत की बुनियाद बन सकती है।

धीरेंद्र कुमार स्पेशल रिपोर्ट