Bihar Politics: पटना की सियासत में नीतीश ट्विस्ट! 20 साल बाद CM कुर्सी से दूरी, दिल्ली की राह क्यों चुन रहे सुशासन बाबू? पढ़िए इनसाइड स्टोरी
आज सबसे बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है जब कभी 44 सीटों के सहारे भी सत्ता की कमान नहीं छोड़ी, तो अब 85 विधायकों के मजबूत समर्थन के बावजूद आखिर क्यों सुशासन बाबू राज्यसभा की राह पकड़ रहे हैं?
Bihar Politics: बिहार की सियासत में इन दिनों एक ऐसा मोड़ आया है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर चाय की चौपाल तक नई बहस छेड़ दी है। राजनीति की तासीर ही कुछ ऐसी होती है हर किसी का मिज़ाज और हाजमा इसे झेल नहीं पाता। दो दशकों तक बिहार की सत्ता के सबसे मजबूत किरदार रहे नीतीश कुमार ने अचानक ऐसा फैसला लिया है, जिसने उनके समर्थकों और सियासी विरोधियों दोनों को हैरत में डाल दिया है।
बीस साल से बिहार की राजनीति में एक ही व्यक्ति को देखने के आदी हो चुके मतदाताओं के लिए यह फैसला किसी सियासी भूचाल से कम नहीं है। जब कभी चुनाव हुआ, नारा यही गूंजा “बिहार की बात, नीतीश के साथ”। यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है जब कभी 44 सीटों के सहारे भी सत्ता की कमान नहीं छोड़ी, तो अब 85 विधायकों के मजबूत समर्थन के बावजूद आखिर क्यों सुशासन बाबू राज्यसभा की राह पकड़ रहे हैं?
कुछ महीने पहले तक सियासी मंचों पर यह भरोसा दिलाया जा रहा था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार ही काबिज रहेंगे। केंद्रीय नेताओं से लेकर सहयोगी दलों तक हर कोई यही कह रहा था कि उनके नेतृत्व को लेकर कोई कन्फ्यूजन नहीं है। यहां तक कि राजनीतिक जानकारों को लगने लगा था कि वह लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं।
लेकिन अचानक आए इस फैसले ने राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट कर दिया है। जेडीयू के कई नेता जहां इसे उनका निजी फैसला बताकर सम्मान जता रहे हैं, वहीं पार्टी के कुछ कार्यकर्ता इसे स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहे। कई जगहों पर नाराजगी और विरोध की खबरें भी सामने आई हैं।
इधर अंदरखाने की खबर है कि उन्हें मनाने की कई कोशिशें हुईं। करीबी नेताओं से लेकर परिवार तक ने समझाने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार नीतीश कुमार अपने फैसले पर अडिग रहे। सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में उन्होंने उस अधूरी ख्वाहिश का जिक्र किया-राजनीति के हर सदन में रहने के बाद एक बार राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा।
अब नामांकन दाखिल हो चुका है और सियासी शतरंज की बिसात पर नई चालें चलनी शुरू हो गई हैं। माना जा रहा है कि बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बन सकता है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह फैसला भविष्य की किसी बड़ी सियासी रणनीति का हिस्सा है या सिर्फ एक निजी राजनीतिक ख्वाहिश का अंजाम। मगर इतना तय है पटना से दिल्ली तक अब एक नए सियासी खेल की शुरुआत हो चुकी है।