आरटीआई पर खून का साया, 20 साल में 21 हत्याएं, 600 से ज़्यादा हमले,बिहार की कानून-व्यवस्था पर संगीन सवाल

Bihar News: पारदर्शिता के दावे और सुशासन के नारे के बीच 2006 से 2026 तक के आंकड़े सियासी जमीर को झकझोर देने वाले हैं।...

RTI Activists 21 Murders in 20 Years
आरटीआई पर खून का साया- फोटो : social Media

Bihar News: पारदर्शिता के दावे और सुशासन के नारे के बीच 2006 से 2026 तक के आंकड़े सियासी जमीर को झकझोर देने वाले हैं। दो दशकों में बिहार में 600 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए या उन्हें झूठे मुकदमों के जाल में फंसाया गया। सबसे खौफनाक सच अब तक 21 जांबाज़ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सीने पर लगे जख्म हैं।

दस्तावेज बताते हैं कि सूचना के अधिकार के जरिए भ्रष्टाचार की परतें खोलने वालों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया गया। राज्य सूचना आयोग ने कई मामलों में अधिकारियों पर 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया, मगर सवाल उठता है क्या करोड़ों के घोटाले छिपाने वालों के लिए यह रकम महज़ ‘राशन-पानी’ नहीं?

सबसे बड़ी सियासी और कानूनी कमजोरी यह है कि यदि सूचना मांगने वाले आवेदक की हत्या हो जाए, तो मांगी गई जानकारी स्वतः उसके परिजनों को नहीं दी जाती। यानी आवेदक की मौत के साथ ही वह सच, वह फाइल, वह राज भी दफन हो जाता है। इंसाफ का दरवाज़ा वहीं बंद हो जाता है। ऐसे में भ्रष्ट अफसरों और ठेकेदारों के लिए यह एक खतरनाक संदेश है खामोशी खरीदो, या आवाज़ खत्म कर दो।

चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज 70% मुकदमे जांच में फर्जी पाए गए। एससी/एसटी एक्ट, महिला उत्पीड़न या अन्य संगीन धाराओं में केस दर्ज कराना एक सोची-समझी रणनीति बनती जा रही है, ताकि आवाज़ उठाने वालों को कानूनी दलदल में उलझाकर चुप करा दिया जाए।

नतीजा यह है कि बढ़ते खतरे और प्रशासनिक बेरुख़ी के चलते कई कार्यकर्ताओं ने सूचना मांगना बंद कर दिया है। लोकतंत्र का प्रहरी खुद असुरक्षित है, तो पारदर्शिता का क्या होगा?

सवाल सीधा है क्या व्यवस्था सच से डरती है? अगर सूचना मांगना जानलेवा साबित हो, तो लोकतंत्र की बुनियाद कितनी मजबूत रह जाएगी? यह वक्त है सियासत के आईने में खुद को देखने का।