पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार के फैसले पर जताई सख्त नाराजगी, सेवाकालीन कर्मचारी पर जारी सरकारी आदेश रद्द...

characterस्टिस कुमार मनीष ने राज्य सरकार और समस्तीपुर के मुख्य अभियंता के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने सरकार के इस दोहरे रवैये पर कड़े शब्दों में कहा कि राज्य कोई बाज़ार का व्यापारी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता है।

Patna High Court
Patna High Court - फोटो : news4nation

Patna High Court : पटना हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर में चार दशकों तक सेवा देने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को रिटायर्ड होने के बाद नया कर्मचारी करार देने पर राज्य सरकार के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई है। जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने राज्य सरकार की दलीलों को रद्द करते हुए विभाग के आदेशों को रद्द कर दिया तथा तीन महीने के भीतर नियमानुकूल पेंशन व वेतन संरक्षण पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।   


पूर्वी चंपारण निवासी विपिन कुमार वर्मा को 16 जून ,1980 को जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर में टाइपस्ट  के पद पर दैनिक वेतनभोगी  के रूप में नियुक्त किया गया था। लगभग 32 वर्षों की निरंतर सेवा के बाद, 5 दिसंबर ,2012 को विभाग ने उन्हें निम्न वर्गीय लिपिक के रूप में नियमित तो किया, लेकिन इसे एक नयी नियुक्ति मान लिया। इस निर्णय से उनका मूल वेतन ₹9,840 से घटकर ₹7,730 हो गया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा, नवंबर 2019 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी 1980 से 2012 तक की 32 साल की सेवा को शून्य मानते हुए पेंशनरी लाभों से वंचित कर दिया गया।  


हाईकोर्ट में बिहार सरकार का पक्ष रखते हुए राज्य के अधिवक्ता ने विभाग के निर्णय का  बचाव किया।सरकारी वकील ने परिपत्र का हवाला देते हुए कहा कि दैनिक वेतनभोगी के रूप में की गई सेवा को किसी भी सरकारी प्रयोजन या पेंशन के लिए सेवा अवधि नहीं माना जा सकता।  उन्होंने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने 2012 में बिना शर्त नयी नियुक्ति स्वीकार की थी, अतः अब वे पुरानी सेवा अवधि जोड़ने का दावा नहीं कर सकते।  


हाई कोर्ट ने ख़ारिज किया तर्क 

जस्टिस कुमार मनीष ने राज्य सरकार और समस्तीपुर के मुख्य अभियंता के इस तर्क को पूरी तरह खारिज  कर दिया। अदालत ने सरकार के इस दोहरे रवैये पर कड़े शब्दों में कहा कि राज्य कोई बाज़ार का व्यापारी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता  है। वह सार्वजनिक कार्यों को पूरा करने वाले कर्मचारियों की पीठ पर बजट का संतुलन नहीं बना सकता।

  

सेवा को मिटाना असंवैधानिक

कोर्ट ने पाया कि समस्तीपुर अंचल में ही याचिकाकर्ता से कनिष्ठ (जूनियर) कर्मचारियों—जैसे महेश राय, दिलीप कुमार राय और बिपिन कुमार सिंह—को 1988 से काल्पनिक नियमितीकरण और पेंशन का लाभ दिया गया, जबकि विपिन कुमार वर्मा को इससे वंचित रखा गया। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का खुला उल्लंघन है।  कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 40 साल की सेवा को मिटाना असंवैधानिक हैं। सुप्रीम कोर्ट के धर्म सिंह (2025) तथा भीखनी देवी (2026) मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दशकों तक लगातार काम लेने के बाद कर्मचारी को अंतिम समय में अस्थाई बताकर सड़क पर छोड़ देना कतई स्वीकार्य नहीं है।  


तीन महीने में निपटान आदेश 

कोर्ट ने समस्तीपुर के मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा जारी उन आदेशों  को रद्द कर दिया, जिनके तहत वेतन संरक्षण और पुरानी सेवा जोड़ने का दावा खारिज किया गया था। कोर्ट ने मुख्य अभियंता एवं संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वे 3 महीने के भीतर याचिकाकर्ता के पेंशन, बिहार सेवा संहिता के नियम-78 के तहत वेतन संरक्षण, और पुरानी सेवा अवधि  की गणना पर एक स्पष्ट और तर्कसंगत आदेश पारित करें।