Patna High Court: OBC के दो पूर्व अफसरों को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत, 2015 के केस में संज्ञान का आदेश रद्द

Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के दो पूर्व अधिकारियों को बड़ी कानूनी राहत दी है। ....

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Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) के दो पूर्व अधिकारियों गोपाल और रूप रॉय को बड़ी कानूनी राहत दी है। हाईकोर्ट ने आरा के नवादा थाना कांड संख्या 292/2015 में उनके खिलाफ संज्ञान लेने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस चंद्र शेखर झा की एकल पीठ ने क्रिमिनल मिसलेनियस याचिका पर की।कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 406, 420 और 120(B) के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को दर्शाने वाली पर्याप्त मूलभूत सामग्री सामने नहीं आती है। सिर्फ आरोप-पत्र में नाम होने के आधार पर किसी आरोपी के खिलाफ संज्ञान का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता।

सिर्फ चार्जशीट में नाम होना पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए ऐसी बुनियादी सामग्री होनी चाहिए, जिससे यह संकेत मिले कि संबंधित आरोपी ने कथित अपराध में किस तरह भूमिका निभाई। कोर्ट के मुताबिक केवल चार्जशीट किसी विशिष्ट आरोपी द्वारा अपराध किए जाने से जुड़े आवश्यक तथ्यों का विकल्प नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के मुताबिक हाईकोर्ट को सामान्य तौर पर मिनी-ट्रायल नहीं करना चाहिए। हालांकि, जहां आरोप और उपलब्ध सामग्री को उनके मूल रूप में देखने पर भी कथित अपराध के आवश्यक घटक सामने नहीं आते, वहां हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के दायरे में आ सकता है।

घटना के समय शाखा में तैनात नहीं थे दोनों अधिकारी

मामले की सामग्री का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि कथित घटना दोनों याचिकाकर्ताओं के संबंधित शाखा में शामिल होने से पहले की बताई गई है। अदालत के अनुसार प्रासंगिक समय पर दोनों में से कोई भी अधिकारी संबंधित शाखा में तैनात नहीं था।कोर्ट ने यह भी गौर किया कि दोनों अधिकारियों के खिलाफ किसी विशिष्ट कार्य, भूमिका या व्यक्तिगत लाभ का आरोप सामग्री से स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता है। इसके विपरीत, अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि पदभार संभालने के बाद जब अनियमितताओं का पता चला तो याचिकाकर्ताओं ने स्वयं कार्रवाई की और पदभार ग्रहण करने के अगले ही दिन सीबीआई को इसकी सूचना दी।

2017 का संज्ञान आदेश हुआ रद्द

हाईकोर्ट ने इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कोई वैध उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अदालत ने माना कि आवश्यक बुनियादी सामग्री के अभाव में कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, भोजपुर (आरा) द्वारा 14 फरवरी 2017 को पारित संज्ञान आदेश को दोनों याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया। इसके साथ ही उससे जुड़ी परिणामी कार्यवाहियों को भी समाप्त कर दिया गया।हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत को संबंधित रिकॉर्ड वापस भेजने का निर्देश दिया है। इस फैसले के बाद 2015 के इस मामले में गोपाल और रूप रॉय के खिलाफ उक्त आपराधिक कार्यवाही पर हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार विराम लग गया है।