बिजली बिल बकाया है तो भी नहीं होगी FIR! पटना हाईकोर्ट के फैसले से उपभोक्ताओं को बड़ी राहत

हाईकोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बिजली बिल का बकाया होना और बिजली चोरी करना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी उपभोक्ता पर लंबे समय से बिजली का बिल बकाया है और वह उसका भुगतान नहीं कर पा रहा है, तो इस आधार पर बिजली चोर नही कह सकते हैं

Patna High Court on Electricity Bill
Patna High Court on Electricity Bill- फोटो : news4nation

Patna High Court on Electricity Bill :  बिहार में बिजली उपभोक्ताओं के लिए पटना हाईकोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ बिजली बिल का भुगतान नहीं करने या बड़ी रकम बकाया होने से किसी उपभोक्ता पर बिजली चोरी का आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। बिजली चोरी के लिए बिजली कानून की धारा 135 के तहत कार्रवाई करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि उपभोक्ता ने बिजली का इस्तेमाल बेईमान मंशा से चोरी या अनधिकृत तरीके से किया था।


जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने पिछले दिनों मो. शाहिद इमाम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया। मामला करीब 5.39 लाख रुपये के बिजली बिल के बकाये से जुड़ा था। बिजली विभाग ने बकाया राशि के कारण कनेक्शन काट दिया था। आरोप था कि कनेक्शन कटने के बाद भी उपभोक्ता ने अनधिकृत तरीके से बिजली का इस्तेमाल किया। इसी आधार पर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।


केवल बिल नहीं भरना बिजली चोरी नहीं

हाईकोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बिजली बिल का बकाया होना और बिजली चोरी करना कानून की नजर में अलग-अलग बातें हैं। अगर किसी उपभोक्ता पर लंबे समय से बिजली का बिल बकाया है और वह उसका भुगतान नहीं कर पा रहा है, तो महज इस आधार पर उसे बिजली चोर नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि धारा 135 के तहत बिजली चोरी का आपराधिक अपराध तभी बनता है, जब कानून में बताए गए चोरी के तत्व मौजूद हों और Dishonest Intention यानी बेईमान मंशा स्थापित हो। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में धारा 126 और धारा 135 के बीच इसी अंतर को स्पष्ट कर चुका है।


धारा 126 और 135 में क्या अंतर?

बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 126 मुख्य रूप से बिजली के unauthorised use यानी अनधिकृत उपयोग से संबंधित है। इसमें निर्धारित सीमा से अधिक लोड का इस्तेमाल या ऐसी स्थिति शामिल हो सकती है, जो बिजली चोरी की श्रेणी में नहीं आती। ऐसे मामलों में उपभोक्ता पर बिजली की अतिरिक्त राशि या सिविल देनदारी तय की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि धारा 126 के तहत कार्रवाई के लिए आपराधिक मंशा साबित करना जरूरी नहीं है।


वहीं धारा 135 बिजली चोरी को आपराधिक अपराध मानती है। उदाहरण के तौर पर मीटर से छेड़छाड़, अवैध कनेक्शन, मीटर को बायपास कर बिजली लेना या बिजली की खपत को जानबूझकर गलत तरीके से छिपाना जैसी परिस्थितियां सामने आने पर धारा 135 के तहत कार्रवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अनधिकृत उपयोग और बिजली चोरी के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर बताया है।


विभाग बकाया बिजली बिल कैसे वसूलेगा?

हाईकोर्ट के फैसले का यह मतलब नहीं है कि उपभोक्ता पर बिजली का बिल बकाया रहने पर विभाग कुछ नहीं कर सकता। बिजली कंपनी बकाया राशि की वसूली के लिए कानूनी और सिविल प्रक्रिया अपना सकती है। कनेक्शन काटना, बकाया राशि का आकलन करना और कानून के तहत वसूली की कार्रवाई करना अलग विषय है।


इसलिए उपभोक्ताओं के लिए राहत यह है कि सिर्फ बिल बकाया होने को बिजली चोरी बताकर धारा 135 में आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हालांकि, अगर जांच में यह सामने आता है कि कनेक्शन काटे जाने के बाद किसी ने अवैध तरीके से बिजली जोड़ी, मीटर से छेड़छाड़ की या जानबूझकर बिजली चोरी की, तो परिस्थितियों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई संभव हो सकती है।


पटना हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि बिजली का कर्जदार होना और बिजली चोर होना एक ही बात नहीं है। किसी उपभोक्ता को धारा 135 के तहत आरोपी बनाने के लिए केवल बकाया बिल पर्याप्त आधार नहीं है; बिजली चोरी के कानूनी तत्वों और आवश्यक आपराधिक मंशा को स्थापित करना होगा।