Patna High Court: भारत-नेपाल सीमा सड़क मुआवजा मामले में पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जांच में सामने ये आई अनियमितता
Patna High Court: भारत-नेपाल सीमा सड़क निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान आवासीय भूमि के नाम पर अधिक मुआवजा लेने वाले भू-स्वामियों को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है।.....
Patna High Court: भारत-नेपाल सीमा सड़क निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान आवासीय भूमि के नाम पर अधिक मुआवजा लेने वाले भू-स्वामियों को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कृषि योग्य जमीन को आवासीय बताकर अधिक मुआवजा दिया गया है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत सरकार अतिरिक्त राशि की वसूली कर सकती है। अदालत ने अररिया के गोवर्धन साह की याचिका खारिज करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा है।न्यायमूर्ति सुधीर सिंह और न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मुआवजे के भुगतान और उसकी वसूली से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर स्थिति स्पष्ट की। इस फैसले से सीमा सड़क परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन के मुआवजे में कथित अनियमितताओं का मामला फिर चर्चा में आ गया है।
2016 में 64 गांवों की 456 एकड़ से अधिक जमीन का हुआ था अधिग्रहण
मामला वर्ष 2016 का है, जब अररिया जिले के नरपतगंज, फारबिसगंज, कुरसाकांटा और सिकटी अंचलों के 64 गांवों में 456 एकड़ से अधिक जमीन भारत-नेपाल सीमा सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी। उस समय आपातकालीन प्रावधानों के तहत अनुमानित मूल्यांकन के आधार पर भू-स्वामियों को मुआवजे का भुगतान किया गया था।आरोप है कि कुछ जमीन को आवासीय श्रेणी में रखकर अधिक मुआवजा और सोलेशियम यानी अतिरिक्त वैधानिक राशि का भुगतान कर दिया गया, जबकि बाद में जांच में संबंधित जमीन कृषि योग्य पाई गई। इससे सरकारी राशि के अतिरिक्त भुगतान का मामला सामने आया।
जांच में सामने आई अनियमितता, 2018 में जारी हुआ वसूली का नोटिस
मामले में शिकायतें मिलने के बाद वर्ष 2017 में छह सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई थी। जांच के दौरान जमीन की प्रकृति और मुआवजे के निर्धारण को लेकर कथित गड़बड़ियां सामने आईं। इसके बाद जिला भू-अर्जन अधिकारी ने मार्च 2018 में नोटिस जारी कर संबंधित भू-स्वामियों से अतिरिक्त भुगतान की राशि लौटाने को कहा।याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अधिग्रहण के समय अधिकारियों ने जमीन को आवासीय माना था। सड़क का निर्माण भी पूरा हो चुका है। ऐसे में कई वर्षों बाद मुआवजे की राशि वापस मांगना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा- अनुमानित मुआवजा अंतिम भुगतान नहीं
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत के समक्ष यह सवाल था कि आपातकालीन प्रावधान के तहत किए गए शुरुआती भुगतान को अंतिम मुआवजा माना जा सकता है या नहीं।फैसले के अनुसार, अनुमानित मूल्यांकन के आधार पर दिया गया शुरुआती मुआवजा अंतिम अवार्ड नहीं होता। अंतिम अवार्ड तैयार होने तक भुगतान की राशि और जमीन की वास्तविक श्रेणी का निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जा सकता है। यदि जांच में अतिरिक्त भुगतान सामने आता है, तो उसकी वसूली कानून के मुताबिक की जा सकती है।
अंतिम अवार्ड के बाद होगी वसूली, भू-स्वामियों को भी मिलेगा कानूनी विकल्प
अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम अवार्ड तैयार होने से पहले बैंक खाता फ्रीज करने जैसी कार्रवाई नहीं की जा सकती। हालांकि, अंतिम अवार्ड जारी होने के बाद अतिरिक्त राशि की वसूली के लिए लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 (Public Demands Recovery Act, 1914) के प्रावधानों का सहारा लिया जा सकता है।
वहीं, जिन भू-स्वामियों को लगता है कि उनकी जमीन वास्तव में आवासीय श्रेणी की थी और उन्हें कम मुआवजा निर्धारित किया गया है, वे अंतिम अवार्ड जारी होने के बाद भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण के समक्ष कानून के तहत मुआवजे के निर्धारण को चुनौती दे सकते हैं।