चांदी की थाल पर उगाही का 'मोर': थाने की हाजत से 'होम डिलीवरी',पटना पुलिस ने चोर और सोनार को किया विदा
एक आर्मी से रिटायर्ड बड़े अधिकारी (रिटायर्ड साहब) के घर से हुई चांदी की थाल की चोरी से हुई। बड़े अधिकारी कि पत्नी ने लिखित आवेदन लोकल थाने को दिया। शक अपने निजी चालक पर जताया। 'खाकी वालों' ने जेब भरने के मौके के रूप में देखा
राजधानी पटना के एक हाई-प्रोफाइल इलाके में स्थित डिफेंस कॉलोनी से शुरू हुआ यह मामला बिहार पुलिस की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े करता है। एक रिटायर्ड कर्नल के घर से चांदी की थाली चोरी होती है, जिसकी शिकायत उनकी पत्नी थाने में दर्ज कराती हैं। पुलिस तफ्तीश में कर्नल साहब का ड्राइवर ही गुनहगार निकलता है, जो पड़ोस के थाना क्षेत्र के एक स्वर्ण व्यवसायी को थाली बेचने की बात कबूलता है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह कानून की रक्षा नहीं बल्कि वर्दी की आड़ में की गई 'प्रोफेशनल उगाही' का नमूना है। पुलिस ने इस पूरे मामले को एफआईआर (FIR) की फाइलों में दर्ज करने के बजाय वसूली के एक सुनहरे अवसर में तब्दील कर दिया।
नियमों की धज्जियां: एसओपी को ठेंगा और सीमा पार 'सीक्रेट' छापेमारी
इस पूरे प्रकरण में पुलिस मुख्यालय के उन आदेशों को सरेआम दरकिनार किया गया, जिनमें छापेमारी के लिए 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) का पालन अनिवार्य बताया गया था। थाना पुलिस ने अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर दूसरे थाना क्षेत्र में दबिश दी, स्वर्ण व्यवसायी को उठाया, लेकिन इसकी सूचना स्थानीय पुलिस या वरीय पदाधिकारियों को देना मुनासिब नहीं समझा। बिना किसी लिखित प्रविष्टि के व्यवसायी को रात भर थाने की हाजत में रखा गया। नियम कहते हैं कि बाहरी क्षेत्र में रेड से पहले स्थानीय थाने को सूचित करना और रोजनामचा में एंट्री करना अनिवार्य है, लेकिन यहाँ 'गुप्त मिशन' के नाम पर केवल अवैध वसूली की पटकथा लिखी जा रही थी।
थाने में 'मोलजोल' का खेल: आधा किलो चांदी और 50 हजार का 'सेवा शुल्क'
जैसे ही स्वर्ण व्यवसायी पुलिस की गिरफ्त में आया, थाने के भीतर न्याय का नहीं बल्कि 'रेट' का तराजू सज गया। व्यवसायी का तर्क था कि थाली गलाने पर मात्र 100 ग्राम चांदी निकली, लेकिन खाकी की भूख इससे कहीं ज्यादा थी। आरोप है कि पुलिस ने 100 ग्राम के बदले आधा किलो चांदी की कीमत वसूली और इस पूरे मामले को 'मैनेज' करने के नाम पर 50 हजार रुपये का अतिरिक्त 'सेवा शुल्क' भी वसूला। इसके बाद कर्नल की पत्नी को चोरी गई थाली के बदले नकद राशि थमाकर मामला शांत करा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि दूसरे दिन व्यवसायी और ड्राइवर दोनों को बिना किसी कानूनी कार्रवाई के 'सकुशल' घर भेज दिया गया।

कप्तान की नाक के नीचे अंधेरगर्दी: अनुत्तरित सवाल और सिस्टम की साख
सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि इस पूरे खेल की भनक नगर के कप्तान (सिटी एसपी) तक को होने की चर्चा है, जो अपनी सख्त छवि और हथियारों की बरामदगी के लिए जाने जाते हैं। सवाल यह उठता है कि उनके नाक के नीचे इतना बड़ा 'खेला' कैसे हो गया? आखिर बगैर प्राथमिकी के किसी व्यक्ति को रात भर हिरासत में क्यों रखा गया? अगर ड्राइवर चोर था तो उसे जेल क्यों नहीं भेजा गया? और अगर व्यवसायी निर्दोष था तो उससे 'वसूली' क्यों की गई? ये सवाल न केवल पटना पुलिस की मंशा पर दाग लगाते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि 'तीसरी आँख' के पहरे में भी खाकी अपनी सुविधा के अनुसार कानून का गला घोंटने से बाज नहीं आ रही है।
बदतर होते हालात: विभाग की सख्ती के बावजूद बेखौफ वसूली
यह घटना इस बात की बानगी है कि थानों में लगे कैमरे भी अब महज शोभा कि वस्तु बन गए है। जबकि थानों में लगे CCTV के वीडियों को 2 साल तक प्रिजर्व रखने का नियम है। सवाल उठता है कि क्या इस बात कि जाँच होती है स्टेशन डायरी और हाजत के फुटेज कि नियमति जाँच SDPO या डीएसपी स्तर के अधिकारी करते भी है या नहीं? दरअसल बिहार पुलिस मुख्यालय द्वारा समय-समय पर की जाने वाली सख्ती और कड़े निर्देशों का असर निचले स्तर पर नहीं दिख रहा है। पटना में 'तीसरी आँख' यानी सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछा होने के बावजूद खाकी के भीतर पनप रहा यह भ्रष्टाचार लगातार बद से बदतर होता जा रहा है। जब रक्षक ही भक्षक बनकर उगाही के खेल में शामिल हो जाएं, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना लाजिमी है। फिलहाल, यह मामला पुलिस महकमे के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है और देखना यह है कि आला अधिकारी इस 'गजब के खेल' पर क्या एक्शन लेते हैं।