Bihar Politics: तेजस्वी के नए सियासी खेल से सम्राट सरकार भौंचक्क...पुलिस भी दंग..आखिर ऐसा क्या हुआ कल..

Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव के बाद तेजस्वी यादव पहली बार सड़क पर जिस अंदाज में नजर आए, उसमें सियासी तेवर भी था और रणनीतिक बदलाव की साफ झलक भी। ...

Tejashwi Sharp Political Attack
तेजस्वी के नए सियासी खेल से सम्राट सरकार भौंचक्क- फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव के बाद तेजस्वी यादव पहली बार सड़क पर जिस अंदाज में नजर आए, उसमें सियासी तेवर भी था और रणनीतिक बदलाव की साफ झलक भी। लोकभवन मार्च के बहाने राष्ट्रीय जनता दल  ने अपने पारंपरिक आंदोलनकारी मिजाज को नई सियासी पैकेजिंग देने की कोशिश की। इस बार पार्टी के झंडे पीछे रहे, हाथों में तिरंगा रहा और आंदोलन के अग्रिम मोर्चे पर युवाओं को उतारा गया। संदेश साफ था तेजस्वी अब सिर्फ पुराने सामाजिक समीकरणों के नेता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की आवाज बनने की सियासी कवायद में हैं।

मार्च से पहले ही पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को बाकायदा फरमान जारी किया कि कोई पार्टी का झंडा लेकर नहीं आएगा। इसके बजाय तिरंगा लेकर आने की अपील की गई। पार्टी की ओर से बड़े आकार के तिरंगे प्लास्टिक पाइप में लगाकर कार्यकर्ताओं को मुहैया कराए गए। इस पूरी कवायद के पीछे सियासी गणित साफ दिखाई दिया। राष्ट्रीय जनता दल चाहती थी कि कैमरों के फ्रेम में पार्टी का झंडा कम और तिरंगा लिए युवा ज्यादा दिखाई दें।

प्रदर्शन में एक हजार से अधिक स्कूली और कॉलेज छात्रों के शामिल होने का दावा किया गया। राष्ट्रीय जनता दल ने इन्हें अपने कार्यकर्ता बताया, लेकिन ग्राउंड पर युवाओं की मौजूदगी को पार्टी ने अपनी नई राजनीतिक तस्वीर के तौर पर पेश किया। पोस्टर, नारे और गानों में भी Gen-Z की झलक दिखाई दी। यानी आंदोलन की पटकथा में पुराने कैडर के साथ नई पीढ़ी को बराबर की जगह देने की कोशिश हुई।

मुख्य माइक की कमान तेजस्वी के करीबी एमएलसी सुनील कुमार सिंह के हाथों में रही। तिरंगे को लेकर लगातार अनुशासन की ताकीद की गई। कार्यकर्ताओं को समझाया गया कि तिरंगा झुकना नहीं चाहिए और सड़क पर गिरना नहीं चाहिए। पूरे मार्च में तिरंगे के सम्मान को लेकर बरती गई सावधानी ने राष्ट्रीय जनता दल की रणनीति को और धार दी।सबसे अहम सियासी संदेश पुलिस के साथ टकराव को लेकर था। माइक से बार-बार कहा गया “पुलिस हमारी दोस्त है।” यानी आंदोलन का निशाना प्रशासनिक अमला नहीं, सीधे सरकार और सत्ता के फैसले थे। हालांकि डाकबंगला चौराहे पर बैरिकेडिंग को लेकर तनातनी हुई और आगे बढ़ने की कोशिश भी हुई। वाटर कैनन चला, लेकिन प्रदर्शन हिंसक संघर्ष में तब्दील नहीं हुआ।

RJD ने एके-47 के मुद्दे को भी आंदोलन की सियासत से जोड़ा। लकड़ी की एके-47 और माथे पर पट्टी बांधे युवाओं के प्रतीकात्मक प्रदर्शन के जरिए सरकार पर युवाओं के खिलाफ कथित बर्बर रवैये का इल्जाम लगाया गया। यह पूरा नैरेटिव मुख्यमंत्री और सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश का हिस्सा था। तेजस्वी के लिए यह मार्च महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनावी शिकस्त के बाद नई राजनीतिक जमीन तलाशने की कवायद भी माना जा सकता है। रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय जनता दल युवा वोटरों के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है। पुराने कैडर और नई पीढ़ी के बीच सियासी पुल बनाने की यह कोशिश आने वाले दिनों में तेजस्वी की राजनीति की नई दिशा का संकेत दे सकती है।