Ramanavami: पथलाफार गांव में रामनवमी पर क्यों नहीं लहराता महावीरी झंडा? जानें इस अनोखी परंपरा के पीछे की कहानी

शेखपुरा के पथलाफार गांव में रामनवमी पर महावीरी झंडा क्यों नहीं लगाया जाता? जानें इस धार्मिक परंपरा के पीछे की रहस्यमय कहानी और सूफी दरगाह से जुड़ी मान्यता।

Ramanavami: पथलाफार गांव में रामनवमी पर क्यों नहीं लहराता मह
rama navami- फोटो : social media

Ramanavami: शेखपुरा जिले का पथलाफार गांव, भारत के उन अनोखे स्थानों में शामिल है जहाँ रामनवमी, देशभर में धूमधाम से मनाए जाने के बावजूद, एक विशेष सांस्कृतिक परहेज के साथ मनाई जाती है। इस गांव में महावीरी पताका नहीं लहराया जाता—एक ऐसी परंपरा जो भय और श्रद्धा के सम्मिलन से जन्मी है।

गांव के बुजुर्गों जैसे कामेश्वर यादव और मोती यादव का कहना है कि यह परंपरा कोई हाल की बात नहीं, बल्कि पीढ़ियों पुरानी है। कभी एक बार जब गांव में रामनवमी के दिन झंडा लगाया गया था, तो अगले ही दिन कई ग्रामीणों की तबीयत अचानक बिगड़ गई। किसी की गर्दन टेढ़ी हो गई, कोई बुखार में तपने लगा। इस घटना को देवी प्रकोप मानते हुए, तुरंत सभी झंडे हटा दिए गए और उसी दिन से यह निर्णय लिया गया कि रामनवमी पर अब झंडा नहीं लगेगा।

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दरगाह का सम्मान या दैवीय चेतावनी? मान्यता के पीछे की गूढ़ धार्मिक समझ

इस अनूठी परंपरा का एक और धार्मिक-सांप्रदायिक समरसता से जुड़ा पक्ष है। गांव के पश्चिम दिशा में स्थित है सूफी संत इसहाक मगरबी की दरगाह, जिसका मुख्य द्वार गांव की ओर खुलता है। ग्रामीणों का मानना है कि रामनवमी पर झंडा लगाने से संत की आत्मा को अपमान महसूस हुआ और उसी का परिणाम थी वह असाधारण बीमारियों की घटना।इसलिए, दरगाह के सम्मान में, गांववासियों ने न केवल झंडा हटाया बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि आगे से यह गलती न दोहराई जाए। यह परंपरा आज धार्मिक समन्वय और सांस्कृतिक चेतना का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुकी है।

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बिना झंडे के भी पूरी श्रद्धा से मनाया जाता है त्योहार

गांव में महावीरी झंडा नहीं लगाया जाता, परन्तु इससे रामनवमी की भक्ति में कोई कमी नहीं आती। हर घर में भगवान राम की पूजा, व्रत, रामचरितमानस का पाठ और आरती होती है। संध्या समय पूरा गांव राम नाम के संकीर्तन में लीन हो जाता है।यह भी दिलचस्प है कि अषाढ़ी पूजा के समय गांव के देवी स्थान पर झंडा जरूर लगाया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि झंडा लगाने की परंपरा पूरी तरह से निषिद्ध नहीं है।यह निषेध केवल रामनवमी से जुड़ा हुआ है, और इसका आधार धार्मिक अनुभवों से जुड़ा हुआ भय है।

भय, श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना से बनी परंपरा

पथलाफार गांव की यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामुदायिक स्मृति, अनुभवजन्य आस्था और सामाजिक संतुलन का प्रतीक है। यह बताता है कि धार्मिक मान्यताएं कभी-कभी डर से नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभव और सम्मान से भी जन्म लेती हैं। झंडा न लगाने का यह निर्णय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील सामाजिक समझ का भी प्रमाण है।