Saudi oil pipeline: सऊदी के तेल एक्सपोर्ट पर हूती हमलों की मार, 1,200 KM Pipeline बंद होने से बढ़ी मुश्किल

Saudi oil pipeline: सऊदी अरब के तेल एक्सपोर्ट पर होर्मुज संकट, हूती हमलों और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद होने की दोहरी मार पड़ी है। जानें तेल सप्लाई पर इसका क्या असर होगा।

Saudi oil pipeline

Saudi oil pipeline: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने दुनिया की तेल सप्लाई के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। सऊदी अरब, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है, कच्चा तेल बाहर भेजने के लिए जिन प्रमुख रास्तों पर निर्भर है, उनमें से कई इस समय दबाव में हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है, जबकि लाल सागर के बाब अल-मंदेब इलाके में हूती गतिविधियों ने समुद्री रास्ते की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब की 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को भी अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है।


होर्मुज बंद होने के बाद पाइपलाइन बनी थी बड़ा सहारा


सऊदी अरब का ज्यादातर कच्चा तेल देश के पूर्वी हिस्से में निकलता है। सामान्य परिस्थितियों में इसका एक बड़ा हिस्सा पर्शियन गल्फ से टैंकरों में लोड होकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है। लेकिन संघर्ष के कारण होर्मुज से जहाजों की आवाजाही काफी कम हो गई है। रॉयटर्स के मुताबिक, युद्ध से पहले इस रास्ते से रोजाना करीब 125 जहाज गुजरते थे, जबकि हाल के दिनों में यह संख्या बहुत नीचे आ गई है।


ऐसे समय में सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल को देश के पूर्वी हिस्से से लाल सागर तक पहुंचाने के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन यानी पेट्रोलाइन पर ज्यादा भरोसा किया। यह करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन है और यानबू के लाल सागर बंदरगाह तक तेल पहुंचाती है। संघर्ष के शुरुआती दौर में इसमें करीब 40 से 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक तेल भेजा जा रहा था। अगस्त में यह मात्रा घटकर करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई थी।


ड्रोन हमले के बाद ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी बंद


अब सऊदी अरब के लिए परेशानी और बढ़ गई है। ड्रोन हमले के बाद ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया। इस पाइपलाइन को होर्मुज का महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता माना जाता है। रॉयटर्स के अनुसार, अगर पाइपलाइन जल्द शुरू नहीं होती है तो सऊदी अरब के पास निर्यात के लिए मौजूद तेल का भंडार कुछ ही दिनों में दबाव में आ सकता है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का अनुमान है कि यानबू में मौजूद स्टॉक करीब 5 से 7 दिन तक निर्यात को बनाए रखने में मदद कर सकता है।


इसका असर सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा। रॉयटर्स के मुताबिक, पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहने पर वैश्विक तेल सप्लाई के करीब 4 फीसदी हिस्से पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि पाइपलाइन बंद होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली और ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया।


लाल सागर का रास्ता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं


सऊदी अरब के सामने दूसरी बड़ी समस्या लाल सागर में है। यमन के हूती समूह की गतिविधियां बाब अल-मंदेब के आसपास बढ़ी हैं। यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। हूतियों की गतिविधियों के कारण सऊदी तेल को लाल सागर के रास्ते एशिया तक पहुंचाना भी पहले जितना आसान नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में यानबू से निकलने वाले कच्चे तेल को मिस्र की ओर भेजकर स्वेज नहर और SUMED पाइपलाइन के जरिए भूमध्य सागर तक पहुंचाने का विकल्प मौजूद है। रॉयटर्स के अनुसार, एशियाई रिफाइनर पहले से इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इससे यात्रा की दूरी और परिवहन लागत काफी बढ़ जाती है।


अफ्रीका के चक्कर से बढ़ रही लागत


अगर तेल को लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते भेजना सुरक्षित या आर्थिक रूप से संभव नहीं रहता, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे यानी केप ऑफ गुड होप से होकर जाना पड़ सकता है। इससे यात्रा में कई दिन और जुड़ जाते हैं और जहाजों के ईंधन, बीमा तथा माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है। रॉयटर्स के अनुसार, सऊदी अरब के यानबू से एशिया जाने वाले जहाजों को मौजूदा परिस्थितियों में सामान्य पूर्वी मार्ग की तुलना में काफी लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है। यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि तेल उपलब्ध है या नहीं। असली चुनौती यह है कि उपलब्ध तेल को सुरक्षित और कम लागत में खरीदारों तक कैसे पहुंचाया जाए। रास्ते लंबा होने पर तेल की कीमत के साथ-साथ समुद्री परिवहन और बीमा खर्च भी बढ़ता है। इसका सीधा असर दुनिया भर के पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।


क्या दुनिया बड़े तेल संकट की तरफ बढ़ रही है?


फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई पूरी तरह रुक जाएगी। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता जरूर बढ़ा दी है। होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित है, ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद है और बाब अल-मंदेब में सुरक्षा जोखिम बढ़ रहा है। यानी सऊदी अरब के पास तेल मौजूद होने के बावजूद उसे बाजार तक पहुंचाने के विकल्प लगातार सीमित हो रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, अगर ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहती है तो वैश्विक बाजार में रोजाना लाखों बैरल तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि बाजार में आगे कीमतों के और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है। भारत, चीन, जापान और दूसरे एशियाई देशों के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन देशों की बड़ी मात्रा में तेल जरूरत खाड़ी क्षेत्र से पूरी होती है। अगर सप्लाई के रास्ते लंबे समय तक बाधित रहते हैं, तो महंगे क्रूड का असर आयात बिल से लेकर ईंधन की कीमतों और महंगाई तक दिखाई दे सकता है।