ऑनलाइन शॉपिंग का मायाजाल ,छलावा बाजार वर्चुअल जुमला का क्या है सच, पढ़िए
ऑनलाइन शॉपिंग बाज़ार सिर्फ सहूलियत का मैदान नहीं, बल्कि लुभावने नारों और लुटेरे वादों का एक ऐसा वर्चुअल गलियारा बन चुका है, जहां रियायत और रियासती फायदों के नाम पर आम नागरिक की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है।
Online Shopping: सियासत की तर्ज पर देखा जाए तो आज का ऑनलाइन शॉपिंग बाज़ार सिर्फ सहूलियत का मैदान नहीं, बल्कि लुभावने नारों और लुटेरे वादों का एक ऐसा वर्चुअल गलियारा बन चुका है, जहां रियायत और रियासती फायदों के नाम पर आम नागरिक की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। जिस तरह चुनावी मंचों से जनता को लुभावने जुमले परोसे जाते हैं, ठीक उसी तरह यह बाज़ार भी विज्ञापनों की चमक-दमक और फ्लैश डील के ज़रिए वोटर यानी ग्राहक को गफलत में डालकर उसके विवेक को हाईजैक कर रहा है।
अवाम को यह यकीन दिला दिया जाता है कि 'महंगाई के इस दौर में यह सबसे बड़ी राहत है', जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उल्टी होती है। ज़रूरत न होने के बावजूद महज़ 'चालीस फीसदी की छूट' का सियासी शिगूफा देखकर लोग बिना सोचे-समझे अपना मत यानी पैसा झोंक देते हैं। यह मुफ्त डिलीवरी और कूपन का मायाजाल दरअसल एक ऐसा दलदल है, जिसमें फंसकर इंसान अपनी गाढ़ी कमाई अनाप-शनाप चीज़ों पर लुटा बैठता है।
यदि लोकतंत्र में जागरूक मतदाता की अहमियत है, तो डिजिटल युग में सतर्क उपभोक्ता होना उतना ही लाज़मी है। तस्वीरों की रंगीन दुनिया और मॉडलों पर सजी पोशाकों के फरेब में आकर फैसले लेना सरासर नासमझी है। बाज़ार की इस सियासत को समझें: जो चीज़ बिना छूट के नहीं खरीदी जाती, वह रियायत मिलने पर भी बचत नहीं बल्कि सरासर फिज़ूलखर्ची है। इसलिए, किसी भी सौदेबाजी पर मुहर लगाने से पहले अपने जमीर और ज़रूरत से सवाल करना बेहद लाज़मी है।
अतः ज़रूरत इस बात की है कि आप महज़ सतही नारों और स्टार रेटिंग के भ्रम में न आएं, बल्कि उत्पाद के विवरण (डिटेल्स), सच्ची समीक्षाओं (रिव्यूज) और वापसी की शर्तों (रिटर्न पॉलिसी) को गहराई से परखें। एक समझदार और होशियार नागरिक वही है जो इस डिजिटल छलावे के मकड़जाल को बेनकाब करते हुए अपनी प्राथमिकताओं और सुरक्षा को सर्वोपरि रखे।