नहीं रहे ज्ञानरंजन, कहानी में भाषा और तेवर का नया शिल्प रचने वाले चार यार परंपरा के थे प्रमुख कथाकार
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को हुआ था। वे वरिष्ठ साहित्यकार रामनाथ सुमन के पुत्र थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया
Gyanranjan passes away : हिंदी साहित्य के वरिष्ठ और विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन का बुधवार, 7 जनवरी की रात 10:30 बजे, 90 वर्ष की आयु में जबलपुर में निधन हो गया। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर है। साठोत्तरी कहानी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर और प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के लंबे समय तक संपादक रहे ज्ञानरंजन के योगदान को हिंदी साहित्य में हमेशा याद किया जाएगा।
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को हुआ था। वे वरिष्ठ साहित्यकार रामनाथ सुमन के पुत्र थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया और वर्ष 1996 में वहीं से सेवानिवृत्त हुए। ज्ञानरंजन ने अपनी पहली कहानी ‘दिवास्वप्नी’ से ही साहित्य जगत में अलग पहचान बनाई। इसके बाद ‘कबाड़खाना’, ‘क्षणजीवी’, ‘सपना नहीं’, ‘फेंस के इधर और उधर’ जैसे चर्चित कहानी संग्रहों और प्रतिनिधि कहानियों के जरिए उन्होंने हिंदी कथा साहित्य को नई भाषा, नया तेवर और नया गद्य दिया। उनकी लेखन शैली में काव्यात्मकता, तीखा सामाजिक बोध और भाषिक प्रयोग की स्पष्ट छाप रही।
‘चार यार’ के रूप में ज्ञानरंजन
वे साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख कथाकारों में गिने जाते थे और ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया को साहित्य जगत में ‘चार यार’ के रूप में जाना जाता था। सातवें दशक के यशस्वी कथाकार के रूप में उन्होंने ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’, ‘अमरूद’ और ‘पिता’ जैसी कहानियों से हिंदी कहानी को नई दिशा दी। उनकी रचनाओं में मध्यवर्गीय जीवन के विरोधाभास, सामाजिक विडंबनाएं और समकालीन यथार्थ प्रभावशाली ढंग से उभरते हैं।
छह कहानी संग्रह प्रकाशित
ज्ञानरंजन ने लगभग 35 वर्षों तक ‘पहल’ पत्रिका का सफल संपादन और प्रकाशन किया, जिसे हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में गिना जाता है। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड समेत कई प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके कुल छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए, हालांकि उनकी कहानियों की संख्या मात्र 25 रही, जिन्हें ‘सपना नहीं’ नामक संकलन में एकत्र किया गया है। उनकी अनूठी गद्य रचना ‘कबाड़खाना’ विशेष रूप से लोकप्रिय रही। कहानी के अलावा उन्होंने साहित्य की अन्य विधाओं में भी महत्वपूर्ण लेखन किया।
कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद
ज्ञानरंजन की कहानियों का हिंदी के अलावा कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनकी रचनाएं भारत के अनेक विश्वविद्यालयों के साथ-साथ ओसाका, लंदन, सैन फ्रांसिस्को, लेनिनग्राद और हाइडेलबर्ग जैसे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्रों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल रहीं। ज्ञानरंजन का निधन हिंदी साहित्य के लिए एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। उनका रचनात्मक अवदान और वैचारिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।