बिहार के द्वादश शिवलिंग, द्वादश ज्योतिर्लिंग-सम महिमामंडित देवाधिदेव के १२ पावन धाम, कीजिए दर्शन
Bihar 12 Shivlings: भारतवर्ष के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की भांति ही बिहार प्रांत में स्थित बारह विश्रुत शिवलिंग अपनी अलौकिक महिमा, प्रामाणिक पुरातात्विक आख्यानों तथा महाकाव्यकालीन प्रसंगों के लिए वंदनीय हैं।
Bihar 12 Shivlings: सनातन धर्म की पौराणिक परंपरा में बिहार की पावन धरा आद्य काल से ही तप, साधना और देव-आराधना का केंद्र रही है। भारतवर्ष के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की भांति ही बिहार प्रांत में स्थित बारह विश्रुत शिवलिंग अपनी अलौकिक महिमा, प्रामाणिक पुरातात्विक आख्यानों तथा महाकाव्यकालीन प्रसंगों के लिए वंदनीय हैं। धर्माचार्यों तथा धर्मग्रंथों के अनुसार इन बारह शिव पीठों का आध्यात्मिक उत्कर्ष अत्यंत विलक्षण है। इनमें से छह पावन शिवलिंगों का सीधा संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जनकपुर गमन, लंका विजय, राज्याभिषेक तथा तीर्थाटन से जुड़ा हुआ है। महाशिवरात्रि के त्रिविध महात्म्य—शिव-पार्वती विवाह, शिवलिंग रूप में प्रकटीकरण तथा विषपान कर सृष्टि की रक्षा—की पावन अनुभूति इन सभी धामों में साकार होती है।
१. सिंहेश्वर स्थान, मधेपुरा: महर्षि श्रृंगी के इष्टदेव और मनोकामना शिवलिंग का प्राकट्य
मधेपुरा स्थित सिंहेश्वर स्थान का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ है 'शृंगेश्वर' अर्थात् श्रृंगी ऋषि के ईश्वर भगवान शिव। रामायण कालीन साक्ष्यों के अनुसार महर्षि ऋष्यश्रृंग का आश्रम यही था, जिन्होंने अयोध्यापति महाराजा दशरथ के लिए सुपुत्र प्राप्ति हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न करवाया था। महाभारत काल में इस क्षेत्र की संगति चम्पारण्य तीर्थ के रूप में मिलती है।सिंहेश्वर स्थान का यह पावन शिवलिंग मनोकामना लिंग के रूप में प्रतिष्ठित है, जो त्रिधा विभक्त (तीन भागों में विभाजित) है। मंदिर परंपरा के अनुसार यह शिवलिंग हरिण के शृंग (सींग) के तीन खंडों से निर्मित निर्मिति माना जाता है। कालखंड के प्रवाह में जब शिवलिंग की तलहटी (गढ़ी) को विस्थापित करने हेतु उत्खनन किया गया, तब यह तथ्य परिलक्षित हुआ कि यह एक विशाल अचल शैल-खंड (चट्टान) से सम्बद्ध है, जिसके अनंतर उत्खनन रोक दिया गया। सम्प्रति, इस मंदिर का संपूर्ण प्रबंधन एवं व्यवस्थापन सिंहेश्वर मंदिर न्यास समिति द्वारा सुचारू रूप से संपादित किया जाता है।

२. गुप्ता धाम, चेनारी (रोहतास): भस्मासुर के भय से शिव की शरणस्थली और प्राकृतिक चूना-शिला शिवलिंग
रोहतास जिले के चेनारी में विंध्य श्रृंखलाओं की दुर्गम कंदराओं में स्थित गुप्ता धाम वह अति-प्राचीन स्थल है, जहां पौराणिक आख्यान के अनुसार दानव भस्मासुर के अमिट वरदान-पाश से मुक्ति हेतु स्वयं देवाधिदेव महादेव ने शरण ग्रहण की थी। गुफा के अंतस्थल में चूना पत्थर (लाइमस्टोन) की प्राकृतिक संरचना से निर्मित एक सुदृढ़ स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान है।
इस धाम का मार्ग अत्यंत कठिन एवं दुर्गम है। गुफा के अभ्यंतर अनेक विस्तृत कक्ष, नृत्यशाला एवं घुड़दौड़ नामक प्राकृतिक संरचनाएं विद्यमान हैं। ऐसी मान्यता है कि 'प्लवंग' काल के दौरान भगवान शिव ने इन गुफाओं की रचना की थी। बिहार का यह एकमात्र ऐसा अनूठा तीर्थ है जहां सामान्य श्रद्धालुओं के अतिरिक्त अपराध बोध से ग्रसित व्यक्ति भी अंतःकरण की शुद्धि हेतु जलाभिषेक करने आते हैं और इस संपूर्ण पावन परिधि में किसी भी प्रकार का अपराध घटित नहीं होता। धाम के मुख्य महंत बलि गिरि के अनुसार, इस तीर्थ की वास्तविक अक्षय संपत्ति वे ४० गाएं हैं, जो दान स्वरूप प्राप्त हुई हैं और जिनके दुग्ध से नित्य प्रति महादेव का पावन अभिषेचन किया जाता है।

३. बाबा गरीबनाथ धाम, मुजफ्फरपुर: स्वयंभू शिवलिंग और सपरिवार महादेव का दिव्य विराजमान
मुजफ्फरपुर का बाबा गरीबनाथ धाम जन-जन की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विख्यात है। इस पावन स्थल का प्रामाणिक इतिहास तीन शताब्दियों से भी अधिक प्राचीन है। वर्ष १८१२ तक यह धाम एक अति-लघु मंदिर के रूप में अवस्थित था, जब शिवदत्त राय ने सात धूर के भूखंड पर प्रथम सुदृढ़ मंदिर का निर्माण करवाया।तत्पश्चात, वर्ष १९४४ में चाचान परिवार द्वारा ढाई कट्ठा भूमि समर्पित कर मंदिर का जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण कराया गया। वर्ष २००६ में पुनः डेढ़ कट्ठा अतिरिक्त भूमि के समावेशन से यह एक विशाल एवं भव्य मंदिर परिसर के रूप में निर्मित हुआ। इस धाम की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां भगवान भोलेनाथ अपने संपूर्ण परिवार माता पार्वती, श्रीगणेश एवं कार्तिकेय के साथ विराजमान हैं। मंदिर के प्रधान पुजारी पं. विनय पाठक के मतानुसार प्रतिवर्ष १५ लाख से अधिक श्रद्धालु यहां आकर पावन जलाभिषेक संपन्न करते हैं।

४. अजगैबीनाथ मंदिर, सुल्तानगंज: जाह्नूगिरि की पावन भूमि, जहां से राम ने उठाई थी प्रथम कांवर
सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा के मध्य एक मनोरम प्राकृतिक शैल-शिखर पर स्थित अजगैबीनाथ मंदिर की महिमा अद्भुत है। प्राचीन काल में यह स्थल महर्षि जाह्नू की तपःस्थली होने के कारण 'जह्नूगिरि' नाम से प्रसिद्ध था। आनंद रामायण में इसे 'विल्वेश्वर शिव धाम' के रूप में अभिहित किया गया है, जबकि शिवपुराण के अनुसार इस शिवलिंग की प्रथम स्थापना गौड़ राजा शशांक द्वारा की गई थी।१५वीं शताब्दी में जब यह शिवलिंग लुप्त हो गया था, तब परम तपस्वी हरनाथ भारती को उनकी तपस्या स्थली में मृगचर्म के नीचे पुनः प्राप्त हुआ। मंदिर के शिखर पर सुवर्ण कलश स्थापित है तथा प्रांगण में ढाई मन वजन का विशाल घंटा सुशोभित है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. अभयकांत चौधरी की कृति 'सुल्तानगंज की संस्कृति' में इस मंदिर का विशद शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत शब्दावली के अनुसार 'अज' का अर्थ अजन्मा (शिव) है और 'गैब' का अर्थ परोक्ष या अदृश्य है। महंत प्रेमानंद गिरि के अनुसार त्रेतायुग में लंका विजय एवं राज्याभिषेक के उपरांत श्रीराम ने सपरिवार तीर्थाटन के क्रम में इसी उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर देवघर (वैद्यनाथ धाम) तक की पैदल कांवर यात्रा की थी और जलाभिषेक किया था।

५. हरिहरनाथ मंदिर, सोनपुर: हर और हरि का एकात्म स्वरूप तथा शैव-वैष्णव संप्रदायों का मिलन-पीठ
सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर विश्व का इकलौता ऐसा दिव्य तीर्थ है, जहां एक ही शिवलिंग के दो पृथक अर्ध-भागों में 'हर' (भगवान शिव) और 'हरि' (भगवान विष्णु) की संयुक्त आकृति उत्कीर्ण है। पौराणिक मान्यता है कि इस विलक्षण एकात्म विग्रह की स्थापना स्वयं सृष्टि-रचयिता भगवान ब्रह्मा ने शैव एवं वैष्णव मतों के मध्य सामंजस्य और सौहार्द स्थापित करने हेतु की थी।श्रीमद्भागवत में वर्णित 'गजेन्द्र-मोक्ष' (गज और ग्राह का युद्ध) का पौराणिक आख्यान इसी पावन तट से सम्बद्ध है। यही वह स्थल है जहां वर्षों तक चले शैव और वैष्णव मतावलंबियों के वैचारिक संघर्ष का शांतिपूर्ण समापन (संघर्ष विराम) हुआ था। रामायणकालीन संदर्भों के अनुसार, भगवान श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र के संग जनकपुर (सीता स्वयंवर) गमन के दौरान यहां विश्राम कर हरि तथा हर की स्थापना एवं आराधना की थी। इसके साक्षी श्रीराम के चरण-चिह्न समीपस्थ हाजीपुर के 'रामचौरा' में आज भी पूजित हैं। मुख्य पुजारी सुशील चंद शास्त्री के मतानुसार, कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर शैव, वैष्णव तथा शाक्त तीनों संप्रदायों के श्रद्धालु एक साथ गंगा-गंडक संगम में स्नान कर जलाभिषेक करते हैं। वर्ष १७५७ से पूर्व यह मंदिर काष्ठ एवं कृष्ण-शिलाखंडों से निर्मित था, जिसका पुनर्निर्माण बाद में मीर कासिम द्वारा कराया गया।

६. गौरीशंकर मंदिर, खुसरूपुर: १२ हजार सूक्ष्म रुद्रों से आच्छादित अद्वितीय बैकटपुर धाम
खुसरूपुर स्थित गौरीशंकर मंदिर का शिवलिंग स्थापत्य एवं अध्यात्म की दृष्टि से अत्यंत विलक्षण है। यह एकाकी शिवलिंग भगवान शंकर तथा माता पार्वती के संयुक्त स्वरूप को प्रदर्शित करता है। इस विशाल शिवलिंग की काया में १२,००० (बारह सौ) अति-सूक्ष्म रुद्र (लघु शिवलिंग) उत्कीर्ण हैं।पौराणिक आख्यानों के अनुसार वर्तमान बैकटपुर क्षेत्र प्राचीन काल में 'वैकुंठ धाम' नाम से विख्यात गहन वन क्षेत्र था। इसी वन प्रांत में 'जरा' नामक राक्षसी का निवास था, जिससे मगध सम्राट जरासंध की उत्पत्ति की किंवदंती जुड़ी है। महाबली जरासंध भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वर्तमान में दृष्टव्य मंदिर के भव्य स्थापत्य का निर्माण मुगल साम्राज्य के प्रधान सेनापति राजा मानसिंह द्वारा करवाया गया था। सम्प्रति, इस ऐतिहासिक मंदिर का प्रबंधन बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के अधीन संचालित होता है।

७. उमानाथ शिव मंदिर, बाढ़: उत्तरवाहिनी गंगा तट पर 'बिहार की काशी' और अंकुरित महादेव
पटना जिले के बाढ़ में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अवस्थित उमानाथ शिव मंदिर को 'बिहार की काशी' का गौरव प्राप्त है। संपूर्ण भारतवर्ष में अति-अल्प स्थलों पर ही गंगा का प्रवाह उत्तरगामी (उत्तर दिशा की ओर) है, जिनमें बनारस (काशी), सुल्तानगंज तथा बाढ़ का उमानाथ धाम प्रमुख हैं। इसी उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर श्रीराम ने विश्वामित्र के साथ जनकपुर जाते समय शिव की विशेष उपासना की थी।मंदिर के पुजारी अजय पांडे के अनुसार, शताब्दियों पूर्व जब स्थानीय लोगों द्वारा शिवलिंग को मूल स्थान से उखाड़कर मंदिर के ठीक मध्य में स्थापित करने हेतु उत्खनन प्रारंभ किया गया, तब भू-गर्भ में शिवलिंग का आकार गहराई के साथ-साथ और अधिक विस्तृत एवं लंबा होता चला गया। अंततः खुदाई रोक दी गई और इस स्वतः संवर्धित स्वरूप के कारण महादेव को अंकुरित महादेव नाम से अभिहित किया गया।

८. अशोक धाम, लखीसराय: श्रीराम द्वारा संस्थापित इंद्रदमनेश्वर महादेव और मुहूर्त-मुक्त संस्कार पीठ
लखीसराय में राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप स्थित इंद्रदमनेश्वर अशोक धाम का शिवलिंग त्रेतायुगीन प्रामाणिकता समेटे हुए एक प्राचीन मनोकामना पीठ है। श्रावण मास में लाखों श्रद्धालु सिमरिया गंगा घाट से पवित्र गंगाजल लेकर ३० किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करके यहां जलाभिषेक हेतु उपस्थित होते हैं। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मंदिर प्रांगण से लखीसराय के अष्टघटी सरोवर स्थित पार्वती मंदिर तक भव्य शिव-बारात का आयोजन किया जाता है।मंदिर के मुख्य पुरोहित पंडित कमल नयन पांडेय के अनुसार, महर्षि श्रृंगी के आश्रम से अपनी ज्येष्ठ बहन शांता के विदा होने के क्रम में किऊल (किलकारी) नदी एवं पतित-पावनि गंगा के पवित्र संगम तट पर भगवान श्रीराम ने स्वयं अपने कर-कमलों से इस शिवलिंग की स्थापना कर पूजन संपन्न किया था। अशोक धाम की एक अत्यंत दुर्लभ सामाजिक-धार्मिक विशेषता यह है कि यहां वर्ष के किसी भी दिन विवाह-संस्कार तथा मुंडन-संस्कार बिना किसी पंचांगीय लग्न या मुहूर्त के शुभ मानकर संपन्न किए जाते हैं।

९. सोमेश्वरनाथ मंदिर, अरेराज: चंद्रदेव द्वारा स्थापित पंचमुखी शिवलिंग और त्रिविध परंपराओं का संगम
पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) से २९ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोण पर नारायणी (गंडक) नदी के तट पर 'अरण्यराज' अर्थात् अरेराज धाम अवस्थित है। स्कंद पुराण, नेपाल माहात्म्य, रोटक व्रत कथा तथा तीर्थराज अरेराज जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इस तीर्थ का विशद उल्लेख मिलता है।यह रामायणकालीन मंदिर जल-सतह से साढ़े सात फीट की गहराई में स्थापित सोम (चंद्रदेव) द्वारा पूजित पंचमुखी शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। शास्त्रों में शिव के जिन पांच अवतारों की परिकल्पना की गई है, यह प्रत्येक मुख उन्हीं एक-एक अवतार का प्रतीक है। मान्यता है कि चंद्रदेव ने अपने शाप एवं पापों से मुक्ति हेतु यहां सोमेश्वरनाथ की कठोर तपस्या की थी। रामायण काल में श्रीराम ने माता जानकी के साथ महाशिवरात्रि के दिन यहां विशेष अभिषेक-पूजन किया था।अरेराज भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां मनौती पूर्ण होने पर महिलाएं अपने आंचल की खूंट पर लोकनर्तकों से नृत्य करवाकर संगीत के आदिदेव नटराज को प्रसन्न करती हैं। यहां शुद्ध घृत एवं चावल के आटे से निर्मित 'रोट' का नैवेद्य अर्पित किया जाता है, जिससे अन्नपूर्णा स्वरूप मां पार्वती अत्यंत प्रसन्न होती हैं। महंत रविशंकर गिरि के अनुसार यह दुनिया का अकेला मंदिर है जहां तीन संप्रदाय अलग-अलग अवसरों पर पूजा करते हैं बसंत पंचमी में शाक्त संप्रदाय, महाशिवरात्रि व श्रावण में शैव संप्रदाय तथा अनंत चतुर्दशी को वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी जलाभिषेक करते हैं।

१०. बूढ़ानाथ मंदिर, भागलपुर: ताड़का वध के उपरांत श्रीराम द्वारा स्थापित महादेव का वृद्ध स्वरूप
भागलपुर में उत्तरवाहिनी गंगा के दक्षिणी तट पर ५० एकड़ की विस्तृत परिधि में फैला बूढ़ानाथ मंदिर अत्यंत समृद्ध एवं आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण पीठ है। महर्षि विश्वामित्र के साथ बक्सर के वनों में राक्षसी ताड़का का वध करने के उपरांत श्रीराम भागलपुर पहुंचे थे और उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना कर देवाधिदेव का अर्चन किया था।मंदिर के महंत शिवनारायण गिरि महाराज के अनुसार, गंगा नदी प्रतिवर्ष ग्रीष्म या वर्षा काल में भगवान शिव एवं माता पार्वती के चरणों को पखारते हुए प्रवाहित होती है। उत्तरवाहिनी गंगा की उपस्थिति इस स्थल के आध्यात्मिक प्राबल्य को बहुगुणित कर देती है। यहां भगवान शंकर का 'वृद्ध स्वरूप' प्रतिष्ठित होने के कारण इन्हें 'बाबा बूढ़ानाथ' कहा जाता है। मंदिर न्यास के पास सुरक्षित ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण संस्कृत श्लोकों में इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं।

११. बाबा सिद्धेश्वरनाथ, जहानाबाद: बाणावर पर्वत पर सिद्ध संप्रदाय द्वारा संस्थापित बाणेश्वर शिव
जहानाबाद जिले के मखदुमपुर प्रखंड स्थित बराबर पर्वत श्रृंखला (सूर्योक गिरि) की गगनचुंबी चोटी पर स्थित बाबा सिद्धेश्वरनाथ मंदिर स्थापत्य कला और शैव दर्शन का अद्भुत संगम है। धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ एवं इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक के अनुसार, शैव मत के 'सिद्ध संप्रदाय' ने शिवलिंग पूजन की सुदीर्घ परंपरा की शुरुआत इसी पर्वत शिखर पर सिद्धेश्वर नाथ की स्थापना करके की थी।महाभारत के 'वन पर्व' में इस पावन शिवलिंग को 'बाणेश्वर शिवलिंग' नाम से संबोधित किया गया है। वर्तमान मंदिर की संरचना का निर्माण छठी शताब्दी के आसपास हुआ माना जाता है। श्रावण मास की अनंत चतुर्दशी के शुभ अवसर पर श्रद्धालु पातालगंगा के पवित्र जल में स्नान कर सिद्धेश्वरनाथ पर जलाभिषेक करते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति करते हैं।

१२. ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर, ब्रह्मपुर (बक्सर): विधाता ब्रह्मा की पापमुक्ति और षट्कोणीय मंदिर का निर्माण
बक्सर जिले के ब्रह्मपुर में अवस्थित ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर का उल्लेख शिव महापुराण में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले अति-पावन तीर्थ के रूप में किया गया है।मंदिर के पुजारी उमालेश जी महाराज तथा कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. धर्मेंद्र तिवारी के अनुसार, जब परमपिता ब्रह्मा को पुरुषोत्तम भगवान विष्णु से सृष्टि की रचना का आदेश प्राप्त हुआ, तब उन्होंने बक्सर की पावन भूमि को अपनी तपस्या की मुख्य धुरी बनाया। कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने अपने तीन मुखों से भगवान शिव को प्रणाम किया। इस पर भगवान विष्णु ने उन्हें सचेत किया कि तीन मुखों से प्रणाम करना महादेव का अनादर एवं पाप है। इस पाप से मुक्ति पाने हेतु ब्रह्मा जी ने बक्सर में विश्वकर्मा को आमंत्रित कर एक पवित्र 'शिवंगम' (ब्रह्मसरोवर) का उत्खनन करवाया तथा षट्कोणीय शिव मंदिर का निर्माण कराकर स्वयं शिवलिंग की स्थापना व अराधना की। तत्पश्चात ब्रह्मा जी इस दोष से पूर्णतः मुक्त हुए।
