Bihar University Act 2026: बिहार की यूनिवर्सिटी व्यवस्था में बड़ा भूचाल, 50 साल पुराना कानून खत्म करने की तैयारी, स्वायत्तता बचाने की जंग तेज, क्या अब प्रशासक तय करेंगे बिहार के शिक्षा की दिशा? पढ़िए इनसाइड स्टोरी
Bihar University Act 2026: बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में करीब पांच दशक बाद सबसे बड़ा कानूनी बदलाव होने जा रहा है।...
Bihar University Act 2026: बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में करीब पांच दशक बाद सबसे बड़ा कानूनी बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार ने विश्वविद्यालयों के संचालन को लेकर लागू बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 को खत्म कर एक नए एकीकृत बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 का मसौदा तैयार किया है। इस प्रस्तावित कानून को लेकर अब शिक्षा जगत से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक घमासान मच गया है।
सरकार का दावा है कि नए अधिनियम से उच्च शिक्षा व्यवस्था को एक समान ढांचे में लाने और प्रशासनिक सुधार करने में मदद मिलेगी। हालांकि, विश्वविद्यालयों के शिक्षक, कर्मचारी और छात्र संगठन इसे स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं। फिलहाल यह प्रस्ताव राज्यपाल के अनुमोदन के लिए भेजा गया है, लेकिन मंजूरी नहीं मिलने के कारण इसे मानसून सत्र में विधानसभा के पटल पर पेश नहीं किया जा सका।
अब इस कानून की किस्मत राज्यपाल के फैसले और सरकार की रणनीति पर निर्भर है। अगर समय रहते मंजूरी मिल जाती है तो सरकार इसे विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश कर सकती है। वहीं, जरूरत पड़ने पर कैबिनेट की मंजूरी के बाद अध्यादेश के रास्ते भी इसे लागू करने का विकल्प मौजूद है।
प्रस्तावित अधिनियम को लेकर सबसे बड़ा विरोध विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर सामने आ रहा है। डीएवी कॉलेज के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रामानंद पाण्डेय ने कहा कि अगर स्नातक शिक्षा को सीधे सरकार के नियंत्रण में ले लिया जाता है तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार को कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और पदाधिकारियों से बातचीत करनी चाहिए।शिक्षकों की चिंता है कि नए कानून के बाद डिग्री कॉलेजों पर सरकार का सीधा नियंत्रण बढ़ जाएगा और विश्वविद्यालयों की भूमिका सीमित हो जाएगी। चर्चा है कि विश्वविद्यालयों के जिम्मे मुख्य रूप से स्नातकोत्तर शिक्षा और शोध कार्य रह जाएंगे, जबकि स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम और कॉलेजों के संचालन में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ सकता है।
पटना विश्वविद्यालय से जुड़े शिक्षकों और छात्रों में इस प्रस्ताव को लेकर खासा आक्रोश है। उनका कहना है कि पटना विश्वविद्यालय की अपनी ऐतिहासिक पहचान और अलग कानून रहा है। वर्ष 1917 में स्थापित पटना विश्वविद्यालय कभी बिहार, झारखंड, ओडिशा और नेपाल तक के कई संस्थानों का संचालन करता था। ऐसे में इसे अन्य विश्वविद्यालयों के साथ एक समान कानून के दायरे में लाना इसकी विरासत और स्वतंत्र पहचान को कमजोर कर सकता है।
प्रोफेसरों का कहना है कि पटना विश्वविद्यालय के कई विभाग देश में अपनी अलग पहचान रखते हैं। यहां के मनोविज्ञान सहित कई विभागों की स्थापना ऐतिहासिक रही है। उनका तर्क है कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा उसकी स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता से जुड़ी हुई है।पटना लॉ कॉलेज के प्रोफेसर का कहना है कि वर्ष 1976 में जब बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम बनाया गया था, तब भी पटना विश्वविद्यालय की अलग पहचान को बरकरार रखा गया था। लेकिन नए अधिनियम के जरिए इसे भी सामान्य विश्वविद्यालयों की श्रेणी में लाने की कोशिश की जा रही है।
बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। एक तरफ सरकार इसे सुधार की दिशा में कदम बता रही है, वहीं शिक्षक और छात्र इसे विश्वविद्यालयों की आजादी और पहचान पर संकट मान रहे हैं। अब सबकी नजर राज्यपाल के फैसले और आने वाले विधानसभा सत्र पर टिकी है।