गिद्ध चरित्र व बिहारी राजनेता : ऑक्सीजन के लिये तड़प-तड़प कर मर रही जनता व बेशर्म नेताओं की घटिया हरकतों से कठिन होता लोगों का जीवन संघर्ष

गिद्ध चरित्र व बिहारी राजनेता : ऑक्सीजन के लिये तड़प-तड़प कर मर रही जनता व बेशर्म नेताओं की घटिया हरकतों से कठिन होता लोगों का जीवन संघर्ष

PATNA :गिद्धों के चरित्र के गहरे अवलोकन के बाद निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इनका भी एक उसूल होता है लेकिन धरती पर पाए जाने वाले रीढ़विहीन धवल वस्त्रधारी नेताओं नामक प्रजाति के चरित्रावलोकन के बाद सपाट कहा जा सकता है कि इनके वृहत्त शब्दकोश में उसूल व चरित्र जैसे कोई शब्द सम्भवतः नहीं होते। अपनी सियासत को चमकाने के लिये ये संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर सकते हैं । हां कुछ अपवाद हो सकते हैं। लेकिन वे भी अपने आकाओं के सामने अपने असीमित स्वार्थ की वजह से साष्टांग समर्पण की मुद्रा में रहते हैं । 

उदाहरणार्थ आप बीजेपी नेता तिवारी के तेवर को देखिये जो दिल्ली में एक नौजवान पत्रकार की कोरोना से हुई मौत पर सिर्फ इसलिये ट्विटरीय दानवी अट्टहास करता है कि वह अपने दिल को और अपने आका को विरोधी दल के नेता के बेटे की असमायिक मौत का लुत्फ उठाने का दावत दे सके। चहुंओर निन्दन के बाद इस नकारे नेता ने अपना घृणित कथन मिटा दिया लेकिन तब तक इसका रक्तपिपासु राजनीतिक चरित्र सुकून पा लिया था। 

खैर समय की सुई को थोड़ा और पीछे कर लेते हैं । कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी, मिलावट और नक़ली दवाएं व सरकारी बदइंतजामी से टूटती सांसे व उखड़ती जिंदगियों के बीच बयानों का दौर सिर्फ और सिर्फ इसलिये जारी है कि एक को लगता है कि हमारी सत्ता बची रहे तो दूसरे को लगता है कि हम सत्ताखोर कैसे बनें। आज की तारीख में जनसमुदाय का एक बड़ा हिस्सा बेबाक होकर कहती है कि  बेइमानी इनके ख़ून में मिली हुई है। मौका देखते ही हाथ साफ करने की विभत्स कला कोई इन रीढ़विहीन धवलवस्त्रधारिओं से सीखे। ओह्ह, मानवता के नाम पर कलंक ये लोग महामारी से त्रस्त जनता का जीवन और कठिन बना रहे हैं।

विरोधी दल का नेता और उनके सहयोगी कभी ट्विटरीय अट्टहास कर तो कभी बयान का घमासान कर यह साबित करने में जुटे हैं कि सत्ता में बैठे लोग घनघोर नकारे हैं। बदइंतजामी के मास्टर बिहार के सीएम साहब और उनकी फौज मौज में है तो दूसरी तरफ आम जन का जिंदगी के लिये संघर्ष चरमोत्कर्ष पर है। है भी, इसमें कोई शक भी नहीं होना चाहिये। अस्पताल के बाहर दहाड़ मारते कोरोना मरीज के परिजनों की विवशता देखिये! इस पर विपक्ष को रचनात्मक राजनीति का हक भी है। लेकिन यहां भी रचनात्मक राजनीति कम संवेदनहीन सियासत की आवोहवा ज्यादा ही दिखती है। 

किसी राज्य के मुखिया के लिये इससे बुरी बात क्या हो सकती है कि प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल का प्रबंधक विवश होकर कहे कि सिर्फ ऑक्सीजन की वजह से तड़प कर मरते हुए लोगों को मैं देखना नहीं चाहता। मुझे सेवामुक्त कर दीजिये। यह विडंबना है कि उसके बाद भी सत्ता पक्ष के लोग ऊंट की तरह मुंह उठाकर सियासत चमकाने में लगे हैं। बेशर्मी की भी एक हद है। कभी-कभी लगता है कि क्या ये लोग वाकई हृदयहीन हैं यकीन मानिए ऐसा नहीं है,मैंने कई दफा इनके अपनों के विपरीत परिस्थिति फंस जाने के बाद बुक्का फाड़ कर दहाड़ मारकर रोते देखा है। सिर्फ दूसरे यानी जिस जनता को जनार्दन कहते हैं उनके लिये अपने जमीर को पर्दानशीं कर के रखते हैं ।

महामारी के इस महाताण्डव के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष का सियासी तांडव जारी है तो दूसरी तरफ ऑक्सीजन व रेमेडिसिवर जैसी दवाओं के अभाव में दम तोड़ती जिंदगियों के परिजनों का अनवरत जंग भी।   विपक्ष जहां ऑक्सीजन के अभाव में तड़प तड़प कर मर रही जनता की चिता से उठ रही लपटों की बेहिसाब आग पर सेंकी हुई सियासी रोटियों का निवाला खा- खा कर अट्टहास कर रहा है तो दूसरी तरफ उसी चिता की आग की जलन से विवश होकर जाग रहा सत्तापक्ष सड़ांध मारते सिस्टम पर श्रृंगाल की तरह जबरन हुआँ-हुआँ का संवेदनहीन राग गाने में जुटा है।

इससे भी इतर विडंबना देखिये कि सियासी ऑक्सीजन पाने के जुगत में लगे एनडीए के वरिष्ठ नेताओं का एक दल आपस मे तू-तू मैं-मैं कर अपना विद्रूप चेहरा उजागर कर रहा है। कोरोना महामारी प्रतिदिन बिहार में मौत का रिकार्ड बना रहा है। मरीजों की संख्या के रफ्तार के आगे सरकारी सिस्टम लाचार है अब भरोसा सिर्फ ऊपरवाले का है। सुप्रीम कोर्ट व कई उच्च न्यायालयों ने कह दिया है हालात आपातकाल जैसे हैं। न केंद्र सरकार और न हीं राज्य सरकार के पास इस महामारी से निपटने की कोई योजना है यह स्पष्ट दिख रहा है। सरकारी बैठकें की जा रही हैं तो दूसरी तरफ ऑक्सीजन का बेतरतीब अभाव, अस्पतालों में बेड की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता से जिंदगियां भी हार रहीं हैं, सियासत जीत रहा है। कोई अपने बाप,कोई अपने बेटा-बेटी, कोई अपनी मां,कोई अपने पति- पत्नी को सामने ही तड़प-तड़प कर मरते देख रहा है तो कोई इस आस में भी भाग रहा है कि किसी तरह मेरे अपनों की जिंदगियां बच जाएं। 

लेकिन इस दौर में मसीहाओं की कमी नहीं है। ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं जो इस भयावह महामारी में दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा बैठे हैं या फिर तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिये दिन रात एक किये हुए हैं, हां इसमें अपवादस्वरूप कुछ धवलवस्त्रधारी भी हैं उनको मेरा सलाम।

कौशलेन्द्र प्रियदर्शी की कलम से

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