जाति आधारित सियासत के शातिराना चाल के मास्टर ने सत्ता में बने रहने का खेला अंतिम दांव, आखिर क्यों नाचती है जाति की थाती पर बिहार की राजनीति ?

जाति आधारित सियासत के शातिराना चाल के मास्टर ने सत्ता में बने रहने का खेला अंतिम दांव, आखिर क्यों नाचती है जाति की थाती पर बिहार की राजनीति ?

पटना. जाति की राजनीति के लिए देश भर में बदनाम बिहार को एक बार फिर से राजनीतिक दलों द्वारा जातीय जनगणना के नाम पर भरमाने का फरमान जारी हो चुका है. बिहार में जाति एक ऐसा वोट फलदायी विषय बना हुआ है जिस पर क्या नीतीश और क्या लालू सबके सुर एक जैसे हैं. किसी दौर में राजद सुप्रीमो लालू यादव पर जाति और धर्म की राजनीति करने का आरोप लगाया जाता था. वहीं नीतीश कुमार खुद को विकास के मुद्दे पर राजनीति करने वाला राजनेता बताते रहे हैं. लेकिन किसी से छिपा नहीं है कि प्रशासनिक स्तर पर किस तरीके से एक खास जाति को ओहदा सँभालने का काम दिया गया. हालांकि अन्य जातियों कें बड़े अफसरों  को भी नीतीश ने जातीय समीकरण के तहत सेट करने का काम किया है. चुकी लालू- राबड़ी के शासन काल में जनता अपराध, जातीय व साम्प्रदायिक राजनीति से उब चुकी थी तो बड़े ही आसानी से कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश के नेतृत्व को बिहार ने स्वीकार किया. जातीय समीकरण का असर भी नीतीश कुमार के हर मंत्रिमंडल में देखने को मिला. नीतीश कुमार ने अपनी जाति के लिए खूब दांव पेच लगाया लेकिन माना जाता है कि नीतीश उन जातियों के लिए जनसंख्या कम रहने के कारण मनमाफिक नहीं कर पाए जिसका वे प्रतिनिधित्व चेहरा हैं. जिस तरह से  नीतीश कुमार जातीय जनगणना की जिद्द पर अड़े हुए हैं उससे ऐसा लगता है मानो अब जाति की थाती पर नीतीश की राजनीति नाचने लगी है. 

केंद्र सरकार के इनकार के बावजूद बिहार सरकार ने अपने खर्चे पर जातीय जनगणना कराने की घोषणा कर दी है. बिहार में ब्रिटिश शासन के दौरान 1931 जातीय जनगणना हुई थी. अब नीतीश कुमार 90 साल के बाद एक बार फिर जातियों को गिनने की कवायद शुरू कराने वाले हैं. सवाल लाजमी है कि क्या बिहार में सबसे जरूरी काम जातियों की गणना ही है? 1931 के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में सवर्ण यानी उंची जातियों की आबादी 13 फीसदी तो पिछड़ा वर्ग की जातियां 19.3 फीसदी था. 19.3 फीसदी में अकेले यादव 11 प्रतिशत थे जबकि कोयरी, कुर्मी क्रमशः 4.1 और 3.6 प्रतिशत और बनिया मात्र 0.6 प्रतिशत थे. वहीं लोहार, बढई , कहार, नाई, कानू, मल्लाह जैसी करीब एक दर्जन जातियों की आबादी दो-दो फीसदी से कम थी. 


दरअसल जातीय जनगणना की जिद्द को समझने के लिए इसके पीछे की राजनीति को समझना होगा. चाहे नीतीश कुमार हों या अन्य राजनीतिक दलों के नेता बिहार में करीब करीब हर दल किसी न किसी जाति का प्रतिनिधित्व चेहरा बने हुए हैं. मसलन राजद ने शुरू से खुद की छवि यादव और मुस्लिम हितैषी बना रखी है तो दिवंगत राम विलास पासवान की तरह ही उनके बेटे चिराग अब पासवानों के नेता बने हुए हैं. इसी तरह मुकेश सहनी भी निषाद तो जीतनराम मांझी मुसहर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं. और नीतीश कुमार भी खुद को इससे अलग नहीं कर पाए हैं. नीतीश प्रत्यक्ष तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से कुर्मी समुदाय के नेता माने जाते हैं. यहाँ तक कि वे कोयरी सहित कई अन्य पिछड़ी जातियों को भी जोड़कर चलने वाले नेता माने जाते हैं. लेकिन, जैसे कोयरी का नेता उपेन्द्र कुशवाहा बने हुए हैं वैसे ही कई अन्य जातियों के छोटे बड़े कुछ अन्य चेहरे हैं. 

 जातियों को गोलबंद करने की पहल

नीतीश कुमार मंडल आयोग की सिफारिशों पर कहते रहे हैं कि इसका पूरा लाभ मंडल से जुडी सभी जातियों को पूरा नहीं मिला है. वर्ष 1990 के दशक के शुरुआती दौर में जब नीतीश कुमार की लालू यादव से दूरियां बढ़ी तब नीतीश ने कुर्मी सम्मेलन कर अपनी शक्ति दिखाई थी. अब एक बार फिर से वे जातीय जनगणना के सहारे कई अन्य जातियों को गोलबंद करने में सक्रिय हुए हैं. पिछड़ों के लिए आरक्षण को 27 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाने की बात कई राजनेता करते रहे हैं. ऐसे में जब जातीय जनगणना होगी तो यह स्पष्ट होगा कि पिछड़ों में किस जाति की कितनी संख्या है. साथ ही संख्या बल से यह भी तय होगा कि कहाँ किस जाति के कितने लोग हैं जिससे चुनावी रणनीति बनाने में दलों को सुविधा होगी. 

लेकिन मूल विषय यही है कि क्या राजनीति हित लाभ से इतर इस कवायद का कोई बड़ा सामाजिक लाभ बिहार को मिलेगा. फ़िलहाल तो ऐसा कुछ नहीं दिखता. किसी बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रखी जाएगी ऐसा भी नहीं है बल्कि यह शुद्ध राजनीतिक माथापच्ची ही है जिसमें राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे. 

जातीय जनगणना का कर्नाटक मॉडल फेल हो चुका है 

जाति से राजनीति चमकाने की ऐसी ही पहल वर्ष 2014 कर्नाटक में शुरू हुई थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्दरमैया ने कर्नाटक में जातीय जनगणना शुरू कराई. बाद में इसका नाम बदलकर सामाजिक-आर्थिक सर्वे किया गया. हालांकि 2017 में सर्वे रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया. माना गया कि इसका मूल कारण सिद्दरमैया के मनमाफिक रिपोर्ट नहीं आना था. जिन जातियों को वे गोलबंद करना चाहते थे उनकी संख्या मनमाफिक नहीं रही. 

संभव है बिहार में भी राज्य सरकार अपने खर्चे पर जिस जातीय जनगणना को कराने की जिद्द ठाने है अगर उसकी रिपोर्ट मनमाफिक नहीं रही तो उसे राजनीतिक दल ठंडे बस्ते में डालने से नहीं चुकेंगे. इन सबके बीच फ़िलहाल बिहार जाट की राजनीति में जकड़ता नजर आ रहा है. 


प्रिय दर्शन शर्मा की रिपोर्ट 

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