चर्चित बंगला लेखक, कवि व आलोचक आलोचक पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय नहीं रहे

चर्चित बंगला लेखक, कवि व आलोचक आलोचक पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय नहीं रहे

बिहार: बिहार प्रगतिशील लेखक संघ चर्चित बांग्ला लेखक, कवि एवं आलोचक प्रो. पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय के निधन पर गहरा शोक प्रकट करता है। उनके निधन से   न सिर्फ बिहार बल्कि हिंदी इलाके में   प्रगतिशील साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन को धक्का लगा है। वे प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार के नेतृत्वकर्ताओं में से थे। प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के वे लंबे वक्त तक अध्यक्ष रहे।  वे 76 वर्ष के थे तथा पिछले कुछ सालों से कोलकाता में रह रहे थे। पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय बिहार बंगला अकादमी के भूतपूर्व अध्यक्ष तथा  बी एन कॉलेज (पटना विश्वविद्यालय) के  बंगला के अवकाशप्राप्त  प्राध्यापक थे। 

अपने कार्यक्षेत्र धनबाद एवं पटना में कई साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय पटना में हिंदी तथा बंगला दोनों भाषाओं की साहित्यिक-सांस्कृतिक  गतिविधयों में   सक्रिय रहा करते । वे पटना के नागरिक समाज   में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। चर्चित बंगला कवि व  अंग्रेज़ी पाक्षिक 'बिहार हेराल्ड' के  सम्पादक बिद्युतपाल के अनुसार " 70 के दशक के अन्त में पटना आने के बाद वह निरन्तर प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े रहे, बिहार बंगाली समिति एवं बिहार बंग्ला अकादमी से जुड़े रहे। अपने प्राध्यापकीय जीवन में वह पटना युनिवर्सिटी टीचर्स एसोसियेशन की सांगठनिक गोतिविधियों में शामिल रहे। हर सांस्कृतिक आयोजन में अपनी पहल पर वह सुनिश्चित करने का प्रयास करते थे कि भाषाई मेलबन्धन का कोई कार्यक्रम बने, बहुभाषी कवि सम्मेलन जैसे आयोजन अवश्य हो। 

दर असल हम सबको जब विभिन्न भाषाओं के कवि, लेखक, बुद्धिजीवियों से सम्पर्क करने की जरुरत होती थी तो हम पूर्णेन्दुदा को पकड़ते थे, या तो उन्ही से फोन करवाते थे, या उनसे फोन नम्बर मांग लेते थे। उनकी कविताओं के दो संकलन प्रकाशित हुए। प्रकाशित निबन्धों का एक संकलन प्रेस में है।" चर्चित कवि अरुण कमल ने बताया " उनका महत्वपूर्ण   बंगला संग्रह है ‘आलोकित द्राधिमार अन्वेषणे ‘ जिस पर गोष्ठी भी हुई थी।  बिहार प्रलेस के बेगूसराय अधिवेशन के लिए वही विभूति बंद्योपाध्याय को लाने दरभंगा गये थे।उन्होंने अनेक अनुवाद भी किए। प्रलेस ने सुभाष मुखोपाध्याय,अमिताभ दास के काव्य पाठ टिकट लगाकर करवाया था। 'परिचय' पत्रिका के संपादक का संवाद कार्यक्रम भी इनके सहयोग से हुआ। 

"आलोकधन्वा ने पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय की मृत्यु को बंगला के साथ साथ हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक समाज के लिए बड़ी क्षति बताया। साहित्यकार होने के अतिरिक्त पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय बिहार में धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक सरोकारों के लिए भी जाने जाते रहे। इन्हीं वजहों से उन्हें 1982 में शिक्षक आन्दोलन में भागलपुर जेल में एक माह तक जेल में भी  रहना पड़ा। प्रगतिशील लेखक संघ उनके उनके प्रति श्रद्धासुमन व्यक्त करते हुए  शोकसंतप्त परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करता है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के द्वारा 8 फरवरी को पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय  के लिए श्रद्धाजंलि सभा का आयोजन मैत्री शांति भवन, बी.एम.दास रोड में किया जाएगा.

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